श्रीमहाभारतम् - देवताओं का अमृतपान :

श्रीमहाभारतम् - देवताओं का अमृतपान :  

श्रीमहाभारतम् - देवताओं का अमृतपान: 

।। श्रीहरिः ।। श्रीगणेशाय नमः  ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।

( आस्तीकपर्व ) एकोनविंशोऽध्यायः

देवताओं का अमृतपान, देवासुर संग्राम तथा देवताओं की विजय...!

समुद्रमंथन के महान प्रसंग में जब अमृत प्रकट हुआ, तब देवताओं और दानवों—

दोनों की दृष्टि उस अमृत पर थी। 

अमृत केवल एक पेय नहीं था, बल्कि देवताओं के लिए अमरत्व की सिद्धि का साधन था। 

इस लिए उसके प्राप्त होते ही देव और दानव पक्षों में अत्यन्त तीव्र संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हुई।

रुधिरेणानुलिप्ताङ्गा निहताश्च महासुराः ।

अद्रीणामिव कूटानि धातुरक्तानि शेरते ।। १५ ।।




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महाभारत के आस्तीकपर्व में वर्णित इस प्रसंग में सौति कहते हैं कि दैत्य और दानव उत्तम कवच धारण करके तथा अनेक प्रकार के शस्त्र लेकर देवताओं की ओर बढ़े। 

उसी समय भगवान् विष्णु ने, नर के साथ रहते हुए, दानवों से अमृत अपने अधिकार में ले लिया। तत्पश्चात् देवताओं ने भगवान् विष्णु से प्राप्त अमृत का पान किया।


वहाँ खून से लथपथ अंगवाले मरे हुए महान् असुर, जो समरभूमि में सो रहे थे, गेरू आदि धातुओं से रँगे हुए पर्वत-शिखरों के समान जान पड़ते थे ।। १५ ।।

हाहाकारः समभवत् तत्र तत्र सहस्रशः ।

अन्योन्यं छिन्दतां शस्त्रैरादित्ये लोहितायति ।। १६ ।।

संध्याके समय जब सूर्यमण्डल लाल हो रहा था, एक - दूसरेके शस्त्रोंसे कटनेवाले सहस्रों योद्धाओंका हाहाकार इधर - उधर सब ओर गूंज उठा ।। १६ ।।


परिघेरायसैस्तीक्ष्णैः संनिकर्षे च मुष्टिभिः।

निघ्नतां समरेऽन्योन्यं शब्दो दिवमिवास्पृशत् ।। १७ ।।

उस समरांगणमें दूरवर्ती देवता और दानव लोहेके तीखे परिघोंसे एक-दूसरेपर चोट करते थे और निकट आ जानेपर आपसमें मुक्का - मुक्की करने लगते थे। 

इस प्रकार उनके पारस्परिक आघात - प्रत्याघातका शब्द मानो सारे आकाशमें गूंज उठा ।। १७ ।।


छिन्धि भिन्धि प्रधाव त्वं पातयाभिसरेति च ।

व्यश्रूयन्त महाघोराः शब्दास्तत्र समन्ततः ।। १८ ।।


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यहाँ शास्त्रीय दृष्टि से एक महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए—

अमृत के प्रकट होने के बाद संघर्ष केवल किसी भौतिक वस्तु के लिए होने वाला सामान्य युद्ध नहीं रह जाता। 

समुद्रमंथन के द्वारा जो दिव्य तत्त्व प्रकट हुआ, उसके अधिकार को लेकर देव और दानव शक्तियों का अंतिम संघर्ष सामने आता है। 

महाभारत इस घटना को अत्यन्त व्यापक दैवी व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत करता है।


उस रणभूमिमें चारों ओर ये ही अत्यन्त भयंकर शब्द सुनायी पड़ते थे कि 'टुकड़े - टुकड़े कर दो, चीर डालो, दौड़ो, गिरा दो और पीछा करो' ।। १८ ।।


एवं सुतुमुले युद्धे वर्तमाने महाभये । 

नरनारायणौ देवौ समाजग्मतुराहवम् ।। १९ ।।

इस प्रकार अत्यन्त भयंकर तुमुल युद्ध हो ही रहा था कि भगवान् विष्णुके दो रूप नर और नारायणदेव भी युद्धभूमिमें आ गये ।। १९ ।।

तत्र दिव्यं धनुर्दृष्ट्वा नरस्य भगवानपि ।

चिन्तयामास तच्चक्रं विष्णुर्दानवसूदनम् ।। २० ।।

भगवान् नारायणने वहाँ नरके हाथमें दिव्य धनुष देखकर स्वयं भी दानवसंहारक दिव्य चक्रका चिन्तन किया ।। २० ।।

ततोऽम्बराच्चिन्तितमात्रमागतं

महाप्रभं चक्रममित्रतापनम् ।

विभावसोस्तुल्यमकुण्ठमण्डलं

सुदर्शनं संयति भीमदर्शनम् ।। २१ ।।

चिन्तन करते ही शत्रुओंको संताप देनेवाला अत्यन्त तेजस्वी चक्र आकाशमार्गसे उनके हाथमें आ गया।


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जब देवता अमृत का पान कर रहे थे, तब राहु नामक दानव देवता का रूप धारण करके उनके मध्य जा बैठा और अमृत पीने लगा। 

सूर्य और चन्द्र ने उसे पहचान लिया तथा देवताओं को उसके विषय में सूचित किया। 

तब भगवान् नारायण ने अपने चक्र से उस दानव का मस्तक उसके शरीर से अलग कर दिया। 

महाभारत के वर्णन में यह घटना उसी समय घटित होती है जब अमृत उसके कण्ठ तक पहुँच चुका था।


वह सूर्य एवं अग्निके समान जाज्वल्यमान हो रहा था। 

उस मण्डलाकार चक्रकी गति कहीं भी कुण्ठित नहीं होती थी। 

उसका नाम तो सुदर्शन था, किंतु वह युद्धमें शत्रुओंके लिये अत्यन्त भयंकर दिखायी देता था ।। २१ ।।


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इसके बाद देव और असुरों के बीच वास्तविक महासंग्राम आरम्भ हुआ।


महाभारत कहता है—


“ततः प्रवृत्तः संग्रामः समीपे लवणाम्भसः।

सुराणामसुराणां च सर्वघोरतरो महान्॥”


अर्थात् खारे समुद्र के समीप देवताओं और असुरों के बीच अत्यन्त भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ। 

चारों ओर शस्त्रों का प्रहार होने लगा। 

तीक्ष्ण प्रास, तोमर तथा अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र युद्धभूमि में प्रयुक्त होने लगे।


युद्ध की तीव्रता इतनी अधिक थी कि रणभूमि में असुरों के शरीर अस्त्र - शस्त्रों से घायल होने लगे। 

कोई चक्र से विदीर्ण हुआ, कोई तलवार से, कोई शक्ति से और कोई गदा के प्रहार से। 

घायल असुर रक्त बहाते हुए पृथ्वी पर गिरने लगे।


तदागतं ज्वलितहुताशनप्रभं भयंकरं करिकरबाहुरच्युतः । 

मुमोच वै प्रबलवदुग्रवेगवान् महाप्रभं परनगरावदारणम् ।। २२ ।।

वहाँ आया हुआ वह भयंकर चक्र प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहा था।

उसमें शत्रुओंके बड़े-बड़े नगरोंको विध्वंस कर डालनेकी शक्ति थी। 

हाथीकी सूँड़के समान विशाल भुजदण्डवाले उग्रवेगशाली भगवान् नारायणने उस महातेजस्वी एवं महाबलशाली चक्रको दानवोंके दलपर चलाया ।। २२ ।।

तदन्तकज्वलनसमानवर्चसं पुनः पुनर्व्यपतत वेगवत्तदा । 

विदारयद् दितिदनुजान् सहस्रशः करेरितं पुरुषवरेण संयुगे ।। २३ ।।

उस महासमरमें पुरुषोत्तम श्रीहरिके हाथोंसे संचालित हो वह चक्र प्रलयकालीन अग्निके समान जाज्वल्यमान हो उठा और सहस्रों दैत्यों तथा दानवोंको विदीर्ण करता हुआ बड़े वेगसे बारम्बार उनकी सेनापर पड़ने लगा ।। २३ ।।


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दहत् क्वचिज्ज्वलन इवावलेलिहत् प्रसह्य तानसुरगणान् न्यकृन्तत । 

प्रवेरितं वियति मुहुः क्षितौ तथा पपौ रणे रुधिरमथो पिशाचवत् ।। २४ ।।

श्रीहरिके हाथोंसे चलाया हुआ सुदर्शन चक्र कभी प्रज्वलित अग्निकी भाँति अपनी लपलपाती लपटोंसे असुरोंको चाटता हुआ भस्म कर देता और कभी हठपूर्वक उनके टुकड़े टुकड़े कर डालता था। 

इस प्रकार रणभूमिके भीतर पृथ्वी और आकाशमें घूम-घूमकर वह पिशाचकी भाँति बार-बार रक्त पीने लगा ।। २४ ।।

तथासुरा गिरिभिरदीनचेतसो मुहुर्मुहुः सुरगणमार्दयंस्तदा । 

महाबला विगलितमेघवर्चसः सहस्रशो गगनमभिप्रपद्य ह ।। २५ ।।

इसी प्रकार उदार एवं उत्साहभरे हृदयवाले महाबली असुर भी, जो जलरहित बादलोंके समान श्वेत रंग के दिखायी देते थे, उस समय सहस्रों की संख्या में आकाश में उड़-उड़कर शिलाखण्डों की वर्षा से बार-बार देवताओं को पीड़ित करने लगे ।। २५ ।।


इसी क्रम में वह प्रसिद्ध श्लोक आता है—


“रुधिरेणानुलिप्ताङ्गा निहताश्च महासुराः।

अद्रीणामिव कूटानि धातुरक्तानि शेरते॥”


अर्थात् रक्त से लिप्त शरीर वाले वे महान् असुर, जो युद्ध में मारे गए थे, इस प्रकार पड़े थे मानो पर्वतों के शिखर लाल धातु से रंजित होकर पड़े हों।


यह वर्णन केवल युद्ध की भयानकता बताने के लिए नहीं है। 

महाभारत की भाषा में प्रकृति और युद्धभूमि के दृश्य को एक साथ रखकर उस घटना की विराटता दिखाई गई है। 

पर्वत-शिखर स्थिर, विशाल और अत्यन्त प्रभावशाली होते हैं; 

उसी प्रकार युद्ध में गिरे हुए महान् असुरों के शरीरों की विशालता और रक्त से ढकी हुई अवस्था को पर्वत-शिखरों के रूपक द्वारा व्यक्त किया गया है।


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इसके पश्चात् रणभूमि में चारों दिशाओं से भयंकर घोष सुनाई देने लगे। 

योद्धा एक - दूसरे को काटने, भेदने, गिराने और आगे बढ़ने के लिए पुकार रहे थे। 

युद्ध केवल दूर से अस्त्र चलाने तक सीमित नहीं रहा; निकट युद्ध भी होने लगा। 

मुक्कों तथा प्रत्यक्ष शारीरिक प्रहारों तक युद्ध पहुँच गया। 

महाभारत इस दृश्य को अत्यन्त उग्र और महाभयकारी रूप में प्रस्तुत करता है।




जब इस प्रकार युद्ध अपने चरम पर पहुँच गया, तब नर और नारायण भी उस युद्धभूमि में उपस्थित हुए। 

महाभारत में नर और नारायण का आगमन इस प्रसंग को और अधिक दिव्य स्वरूप प्रदान करता है। 

नर के हाथ में दिव्य धनुष देखकर नारायण ने अपने दानव - संहारक चक्र का स्मरण किया। 

तत्पश्चात् भगवान् नारायण ने उस दिव्य चक्र को युद्ध में प्रवर्तित किया।


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सुदर्शन चक्र का वर्णन महाभारत अत्यन्त तेजस्वी रूप में करता है। 

वह प्रज्वलित अग्नि के समान प्रकाशित था और अत्यन्त भयंकर वेग से युद्धभूमि में घूमता हुआ दैत्य तथा दानव समूहों का संहार करने लगा। 

महाभारत के अनुसार वह सहस्रों दैत्यों और दानवों को विदीर्ण करता हुआ आगे बढ़ा।


यहाँ भगवान् विष्णु के चक्र का महत्व केवल एक युद्धास्त्र के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। 

शास्त्रीय परम्परा में चक्र भगवान् की दैवी शक्ति, धर्मसंरक्षण और अधर्म - विनाश का प्रतीक भी है। 

महाभारत के इस प्रसंग में चक्र का प्रयोग उस समय होता है जब देव और दानवों का संघर्ष अत्यन्त विकराल हो चुका है।


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दूसरी ओर दानव भी अपने सामर्थ्य से पीछे नहीं हटे। 

वे आकाश में उठकर देवताओं पर पर्वतों को फेंकने लगे। 

महाभारत का वर्णन बताता है कि वे पर्वत वृक्षों सहित आकाश से गिरते थे और आपस में टकराकर भयंकर गर्जना उत्पन्न करते थे। 

चारों ओर पर्वतों के गिरने, योद्धाओं की गर्जना और अस्त्रों के प्रहार से पृथ्वी तक काँपने लगी।


यह दृश्य इस बात को स्पष्ट करता है कि यह कोई साधारण युद्ध नहीं था। 

यहाँ युद्ध का विस्तार पृथ्वी से आकाश तक दिखाई देता है। 

असुर आकाशमार्ग से पर्वतों का प्रहार करते हैं और देवपक्ष उस आक्रमण का प्रतिकार करता है।


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तब नर ने अपने दिव्य बाणों से उन पर्वतों को विदीर्ण करना प्रारम्भ किया। 

स्वर्णमय अग्रभाग वाले उनके बाण पर्वत - शिखरों को चूर्ण करने लगे। 

पर्वतों के टूटने और बिखरने से आकाश धूल से भर गया। 

इस प्रकार असुरों द्वारा किया गया पर्वत-प्रहार भी निष्फल होने लगा।


भगवान् नारायण का सुदर्शन चक्र दूसरी ओर दानव - समूहों का संहार कर रहा था। 

देवताओं का प्रतिरोध और नर-नारायण की दिव्य शक्ति मिलकर युद्ध का परिणाम देवताओं के पक्ष में ले जाने लगी।


जब असुरों ने देखा कि देवताओं का पक्ष अत्यन्त प्रबल हो गया है और भगवान् नारायण का सुदर्शन चक्र आकाश में अग्नि के समान घूम रहा है, तब वे युद्धभूमि से पीछे हटने लगे। 

महाभारत के अनुसार अनेक शक्तिशाली दानव पृथ्वी के भीतर चले गए और कुछ खारे समुद्र में प्रवेश कर गए।


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इस प्रकार देवताओं की विजय हुई।


विजय प्राप्त करने के बाद देवताओं ने मन्दर पर्वत का सम्मान किया और उसे पुनः उसके आधार पर स्थापित किया। 

अमृतधारी देवताओं ने विजय के उल्लास में दिव्य घोष किया और अपने - अपने धाम की ओर लौट गए। 

इन्द्र आदि देवताओं ने अमृत के पात्र को भगवान् नारायण की सुरक्षा में सौंप दिया।


इस प्रसंग का शास्त्रीय तात्पर्य


इस कथा को केवल देवताओं और असुरों के युद्ध के रूप में पढ़ना इसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देना होगा। 

महाभारत के इस प्रसंग में समुद्रमंथन के बाद अमृत की प्राप्ति, अमृत का संरक्षण, राहु का छलपूर्वक अमृत ग्रहण करना, उसका तत्काल उद्घाटन, भगवान् विष्णु द्वारा व्यवस्था की रक्षा तथा अन्ततः देवासुर-संग्राम—


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ये सभी घटनाएँ एक ही क्रम में जुड़ी हुई हैं।


अमृत प्राप्त होने पर भी दानवों की शक्ति समाप्त नहीं हुई थी। 

वे युद्ध करते हैं, पर्वतों का प्रहार करते हैं और आकाश तक युद्ध का विस्तार कर देते हैं। 

इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल किसी दिव्य वस्तु की प्राप्ति से संघर्ष समाप्त नहीं हो जाता। 

प्राप्त दिव्य शक्ति की रक्षा और धर्मानुकूल व्यवस्था की स्थापना भी आवश्यक है।


राहु का प्रसंग इस कथा में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। 

वह देवता का रूप धारण करके देवताओं के बीच बैठता है और अमृत ग्रहण करता है। 

परन्तु सूर्य और चन्द्र उसे पहचान लेते हैं। 

इससे शास्त्रीय कथा में यह संकेत मिलता है कि बाहरी रूप धारण कर लेने से वास्तविक स्वरूप छिप नहीं जाता। 

सत्य का प्रकाश अन्ततः भेद प्रकट करता है।


भगवान् नारायण द्वारा चक्र से उसका मस्तक अलग किया जाना भी उसी क्रम का भाग है। 

अमृत उसके कण्ठ तक पहुँच चुका था, इसलिए कथा आगे चलकर राहु के विशिष्ट स्वरूप से भी जुड़ती है; परन्तु इस अध्याय का तत्काल प्रसंग देवासुर-संग्राम और देवताओं की विजय है।

युद्ध के वर्णन में रक्त, कटे हुए अंग, अस्त्रों की मार, पर्वतों का गिरना और पृथ्वी का काँपना जैसी बातें आती हैं। 

इन्हें आधुनिक सामान्य युद्ध की तरह समझना उचित नहीं होगा। 

महाभारत स्वयं इस युद्ध को दिव्य एवं असाधारण स्तर पर प्रस्तुत करता है। 

इसलिए इसकी भाषा भी सामान्य मानवीय युद्ध-वर्णन से कहीं अधिक विराट है।


श्लोक—


“रुधिरेणानुलिप्ताङ्गा निहताश्च महासुराः।

अद्रीणामिव कूटानि धातुरक्तानि शेरते॥”


में कवि ने रक्त से लिप्त पड़े असुरों को धातुरक्त पर्वत-शिखरों के समान कहा है। 

यहाँ “अद्रीणामिव कूटानि” उपमा है—

अर्थात् पर्वतों के शिखरों के समान। 

यह उपमा युद्धभूमि की विशालता और भयंकरता दोनों को एक साथ सामने रखती है।


अन्ततः देवताओं की विजय केवल उनके बाहुबल से नहीं, बल्कि कथा के धार्मिक ढाँचे में दैवी व्यवस्था की स्थापना के रूप में सामने आती है। 

भगवान् विष्णु अमृत को दानवों से अलग करते हैं, देवताओं को अमृत प्राप्त होता है, राहु का छल प्रकट होता है, नारायण का चक्र अधर्मकारी शक्ति का विनाश करता है और अन्त में देवगण विजय प्राप्त करके अपने धाम लौटते हैं।


इस प्रकार आस्तीकपर्व का यह अध्याय समुद्रमंथन के बाद घटित घटनाओं का अत्यन्त महत्वपूर्ण चरण है। 

यहाँ अमृत की प्राप्ति के साथ कथा समाप्त नहीं होती; बल्कि अमृत के कारण उत्पन्न अधिकार-संघर्ष अपने चरम तक पहुँचता है। 

देव और दानवों का महासंग्राम होता है, रणभूमि में असुरों का संहार होता है, नर-नारायण का दिव्य प्रभाव प्रकट होता है और भगवान् विष्णु के सुदर्शन चक्र द्वारा युद्ध का निर्णायक परिणाम सामने आता है।


अतः इस प्रसंग का मूल शास्त्रीय क्रम है—


समुद्रमंथन → अमृत की प्राप्ति → अमृत का देवताओं को प्राप्त होना → राहु का देव-वेश में अमृत ग्रहण → सूर्य-चन्द्र द्वारा पहचान → नारायण द्वारा चक्र से राहु का मस्तक-विच्छेद → देवासुर महासंग्राम → असुरों का प्रबल प्रतिकार → नर-नारायण का युद्ध में आगमन → सुदर्शन चक्र का प्रवर्तन → असुरों का संहार → देवताओं की विजय → मन्दर पर्वत की पुनः स्थापना → देवताओं का अपने धाम लौटना।

( पंडारामा प्रभु राज्यगुरु )

क्रमशः...

शेष अगले अंक में जारी 

!!!!! शुभमस्तु !!!

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🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-

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मासिक दुर्गाष्टमी

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