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पुराणिक सुंदर कहानी / " विश्वाश "

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

पुराणिक सुंदर कहानी / " विश्वाश "


पुराणिक सुंदर कहानी


जीवन को स्वर्ग बनाने के लिए...!

स्वभाव अच्छा बनाइये!

इस के लिए चेहरे पर प्रसन्नता रखिए...!




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व्यवहार में शालीनता....!

वाणी में मधुरता और हाथों में उदारता रखिए!!

अच्छा रखेंगे स्वभाव तो अच्छा पड़ेगा प्रभाव!!

संबंधो में मिठास हमेशा बनी रहे, तभी परिवार में खुशियां और आनंद महसूस करेंगे।

जब तक इंसान हमारे साथ होता है, हम जीवन भर उसकी कमी कमजोरी ही निकालते रहते हैं, और एक बार उसके इस जीवन से विदा लेते ही, हमें महसूस होता है, कि कमी कमजोरी के साथ ही सही, वो इंसान हमारे साथ ज़रूर रहे, अतः कोशिश लोगों में सदा अच्छाई देखने की ही होनी चाहिए।

दूसरों की " खुशी में अपनी  खुशी देखना एक बहुत बड़ा हुनर " है और जो इंसान ये हुनर सीख जाता है, वो कभी भी " दुःखी " नहीं होता।

जो व्यक्ति नित्य " अपने से बडों का सम्मान " और सेवा  करता है उस व्यक़्ति की चार चीजें बढती है:       आयु ,विद्या,यश और बल.       

सदा अपने से बडों का सम्मानकरें!

कृष्ण भगवान से प्रार्थना करते हैं कि आप और आपके परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें।
जय श्री राधे, जय श्री कृष्ण🙏🙏






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 " विश्वाश " 

मेरी बेटी की शादी थी और मैं कुछ दिनों की छुट्टी ले कर शादी के तमाम इंतजाम को देख रहा था. उस दिन सफर से लौट कर मैं घर आया तो पत्नी ने आ कर एक लिफाफा मुझे पकड़ा दिया. लिफाफा अनजाना था लेकिन प्रेषक का नाम देख कर मुझे एक आश्चर्यमिश्रित जिज्ञासा हुई.

‘अमर विश्वास’ एक ऐसा नाम जिसे मिले मुझे वर्षों बीत गए थे. मैंने लिफाफा खोला तो उस में 1 लाख डालर का चेक और एक चिट्ठी थी. इतनी बड़ी राशि वह भी मेरे नाम पर. मैं ने जल्दी से चिट्ठी खोली और एक सांस में ही सारा पत्र पढ़ डाला. पत्र किसी परी कथा की तरह मुझे अचंभित कर गया. लिखा था :

आदरणीय सर, मैं एक छोटी सी भेंट आप को दे रहा हूं. मुझे नहीं लगता कि आप के एहसानों का कर्ज मैं कभी उतार पाऊंगा. ये उपहार मेरी अनदेखी बहन के लिए है. घर पर सभी को मेरा प्रणाम...!

आप का, अमर.

मेरी आंखों में वर्षों पुराने दिन सहसा किसी चलचित्र की तरह तैर गए.

एक दिन मैं चंडीगढ़ में टहलते हुए एक किताबों की दुकान पर अपनी मनपसंद पत्रिकाएं उलटपलट रहा था कि मेरी नजर बाहर पुस्तकों के एक छोटे से ढेर के पास खड़े एक लड़के पर पड़ी. वह पुस्तक की दुकान में घुसते हर संभ्रांत व्यक्ति से कुछ अनुनय विनय करता और कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर वापस अपनी जगह पर जा कर खड़ा हो जाता. मैं काफी देर तक मूकदर्शक की तरह यह नजारा देखता रहा. पहली नजर में यह फुटपाथ पर दुकान लगाने वालों द्वारा की जाने वाली सामान्य सी व्यवस्था लगी, लेकिन उस लड़के के चेहरे की निराशा सामान्य नहीं थी. वह हर बार नई आशा के साथ अपनी कोशिश करता, फिर वही निराशा.






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मैं काफी देर तक उसे देखने के बाद अपनी उत्सुकता दबा नहीं पाया और उस लड़के के पास जा कर खड़ा हो गया. वह लड़का कुछ सामान्य सी विज्ञान की पुस्तकें बेच रहा था. मुझे देख कर उस में फिर उम्मीद का संचार हुआ और बड़ी ऊर्जा के साथ उस ने मुझे पुस्तकें दिखानी शुरू कीं. मैं ने उस लड़के को ध्यान से देखा. साफसुथरा, चेहरे पर आत्मविश्वास लेकिन पहनावा बहुत ही साधारण. ठंड का मौसम था और वह केवल एक हलका सा स्वेटर पहने हुए था. पुस्तकें मेरे किसी काम की नहीं थीं फिर भी मैं ने जैसे किसी सम्मोहन से बंध कर उस से पूछा, ‘बच्चे, ये सारी पुस्तकें कितने की हैं?’

‘आप कितना दे सकते हैं, सर?’

‘अरे, कुछ तुम ने सोचा तो होगा.’

‘आप जो दे देंगे,’ लड़का थोड़ा निराश हो कर बोला.

‘तुम्हें कितना चाहिए?’ उस लड़के ने अब यह समझना शुरू कर दिया कि मैं अपना समय उस के साथ गुजार रहा हूं.

‘5 हजार रुपए,’ वह लड़का कुछ कड़वाहट में बोला.

‘इन पुस्तकों का कोई 500 भी दे दे तो बहुत है,’ मैं उसे दुखी नहीं करना चाहता था फिर भी अनायास मुंह से निकल गया.

अब उस लड़के का चेहरा देखने लायक था. जैसे ढेर सारी निराशा किसी ने उस के चेहरे पर उड़ेल दी हो. मुझे अब अपने कहे पर पछतावा हुआ. मैंने अपना एक हाथ उस के कंधे पर रखा और उससे सांत्वना भरे शब्दों में फिर पूछा, ‘देखो बेटे, मुझे तुम पुस्तक बेचने वाले तो नहीं लगते, क्या बात है. साफसाफ बताओ कि क्या जरूरत है?’

वह लड़का तब जैसे फूट पड़ा. शायद काफी समय निराशा का उतार चढ़ाव अब उस के बरदाश्त के बाहर था.

‘सर, मैं 10+2 कर चुका हूं. मेरे पिता एक छोटे से रेस्तरां में काम करते हैं. मेरा मेडिकल में चयन हो चुका है. अब उस में प्रवेश के लिए मुझे पैसे की जरूरत है. कुछ तो मेरे पिताजी देने के लिए तैयार हैं, कुछ का इंतजाम वह अभी नहीं कर सकते,’ लड़के ने एक ही सांस में बड़ी अच्छी अंगरेजी में कहा.

‘तुम्हारा नाम क्या है?’ 

मैं ने मंत्रमुग्ध हो कर पूछा?

‘अमर विश्वास.’

‘तुम विश्वास हो और दिल छोटा करते हो. कितना पैसा चाहिए?’

‘5 हजार,’ अब की बार उस के स्वर में दीनता थी.

‘अगर मैं तुम्हें यह रकम दे दूं तो क्या मुझे वापस कर पाओगे? 

इन पुस्तकों की इतनी कीमत तो है नहीं,’ इस बार मैं ने थोड़ा हंस कर पूछा.

‘सर, आप ने ही तो कहा कि मैं विश्वास हूं. आप मुझ पर विश्वास कर सकते हैं. मैं पिछले 4 दिन से यहां आता हूं, आप पहले आदमी हैं जिस ने इतना पूछा. अगर पैसे का इंतजाम नहीं हो पाया तो मैं भी आप को किसी होटल में कप प्लेटें धोता हुआ मिलूंगा,’ उस के स्वर में अपने भविष्य के डूबने की आशंका थी.

उस के स्वर में जाने क्या बात थी जो मेरे जेहन में उस के लिए सहयोग की भावना तैरने लगी. मस्तिष्क उसे एक जालसाज से ज्यादा कुछ मानने को तैयार नहीं था, जबकि दिल में उस की बात को स्वीकार करने का स्वर उठने लगा था. आखिर में दिल जीत गया. मैंने अपने पर्स से 5 हजार रुपए निकाले, जिन को मैं शेयर मार्किट में निवेश करने की सोच रहा था, उसे पकड़ा दिए. वैसे इतने रुपए तो मेरे लिए भी माने रखते थे, लेकिन न जाने किस मोह ने मुझसे वह पैसे निकलवा लिए.

‘देखो बेटे, मैं नहीं जानता कि तुम्हारी बातों में, तुम्हारी इच्छाशक्ति में कितना दम है, लेकिन मेरा दिल कहता है कि तुम्हारी मदद करनी चाहिए, इसीलिए कर रहा हूं. तुम से 4-5 साल छोटी मेरी बेटी भी है मिनी. सोचूंगा उस के लिए ही कोई खिलौना खरीद लिया,’ मैंने पैसे अमर की तरफ बढ़ाते हुए कहा.

अमर हतप्रभ था. शायद उसे यकीन नहीं आ रहा था. उस की आंखों में आंसू तैर आए. उस ने मेरे पैर छुए तो आंखों से निकली दो बूंदें मेरे पैरों को चूम गईं.

‘ये पुस्तकें मैं आप की गाड़ी में रख दूं ?’

‘कोई जरूरत नहीं. इन्हें तुम अपने पास रखो. यह मेरा कार्ड है, जब भी कोई जरूरत हो तो मुझे बताना.’

वह मूर्ति बन कर खड़ा रहा और मैं ने उस का कंधा थपथपाया, कार स्टार्ट कर आगे बढ़ा दी.

कार को चलाते हुए वह घटना मेरे दिमाग में घूम रही थी और मैं अपने खेले जुए के बारे में सोच रहा था, जिस में अनिश्चितता ही ज्यादा थी. कोई दूसरा सुनेगा तो मुझे एक भावुक मूर्ख से ज्यादा कुछ नहीं समझेगा. अत: मैंने यह घटना किसी को न बताने का फैसला किया.

दिन गुजरते गए. अमर ने अपने मेडिकल में दाखिले की सूचना मुझे एक पत्र के माध्यम से दी. मुझे अपनी मूर्खता में कुछ मानवता नजर आई. एक अनजान सी शक्ति में या कहें दिल में अंदर बैठे मानव ने मुझे प्रेरित किया कि मैं हजार 2 हजार रुपए उस के पते पर फिर भेज दूं. भावनाएं जीतीं और मैंने अपनी मूर्खता फिर दोहराई. 

दिन हवा होते गए. उस का संक्षिप्त सा पत्र आता जिस में 4 लाइनें होतीं. 2 मेरे लिए, एक अपनी पढ़ाई पर और एक मिनी के लिए, जिसे वह अपनी बहन बोलता था. मैं अपनी मूर्खता दोहराता और उसे भूल जाता. मैंने कभी चेष्टा भी नहीं की कि उस के पास जा कर अपने पैसे का उपयोग देखूं, न कभी वह मेरे घर आया. कुछ साल तक यही क्रम चलता रहा. एक दिन उस का पत्र आया कि वह उच्च शिक्षा के लिए आस्ट्रेलिया जा रहा है. छात्रवृत्तियों के बारे में भी बताया था और एक लाइन मिनी के लिए लिखना वह अब भी नहीं भूला.





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मुझे अपनी उस मूर्खता पर दूसरी बार फख्र हुआ, बिना उस पत्र की सचाई जाने. समय पंख लगा कर उड़ता रहा. अमर ने अपनी शादी का कार्ड भेजा. वह शायद आस्ट्रेलिया में ही बसने के विचार में था. मिनी भी अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी थी. एक बड़े परिवार में उस का रिश्ता तय हुआ था. अब मुझे मिनी की शादी लड़के वालों की हैसियत के हिसाब से करनी थी. एक सरकारी उपक्रम का बड़ा अफसर कागजी शेर ही होता है. शादी के प्रबंध के लिए ढेर सारे पैसे का इंतजाम…उधेड़बुन…और अब वह चेक ?

मैं वापस अपनी दुनिया में लौट आया. मैंने अमर को एक बार फिर याद किया और मिनी की शादी का एक कार्ड अमर को भी भेज दिया.

शादी की गहमागहमी चल रही थी. मैं और मेरी पत्नी व्यवस्थाओं में व्यस्त थे और मिनी अपनी सहेलियों में. एक बड़ी सी गाड़ी पोर्च में आ कर रुकी. एक संभ्रांत से शख्स के लिए ड्राइवर ने गाड़ी का गेट खोला तो उस शख्स के साथ उस की पत्नी जिस की गोद में एक बच्चा था, भी गाड़ी से बाहर निकले.

मैं अपने दरवाजे पर जा कर खड़ा हुआ तो लगा कि इस व्यक्ति को पहले भी कहीं देखा है. उस ने आ कर मेरी पत्नी और मेरे पैर छुए.




‘‘सर, मैं अमर…’’ वह बड़ी श्रद्धा से बोला.

मेरी पत्नी अचंभित सी खड़ी थी. मैंने बड़े गर्व से उसे सीने से लगा लिया. उस का बेटा मेरी पत्नी की गोद में घर सा अनुभव कर रहा था. मिनी अब भी संशय में थी. अमर अपने साथ ढेर सारे उपहार ले कर आया था. मिनी को उस ने बड़ी आत्मीयता से गले लगाया. मिनी भाई पा कर बड़ी खुश थी.

अमर शादी में एक बड़े भाई की रस्म हर तरह से निभाने में लगा रहा. उस ने न तो कोई बड़ी जिम्मेदारी मुझ पर डाली और न ही मेरे चाहते हुए मुझे एक भी पैसा खर्च करने दिया. उस के भारत प्रवास के दिन जैसे पंख लगा कर उड़ गए.

इस बार अमर जब आस्ट्रेलिया वापस लौटा तो हवाई अड्डे पर उस को विदा करते हुए न केवल मेरी बल्कि मेरी पत्नी, मिनी सभी की आंखें नम थीं. हवाई जहाज ऊंचा और ऊंचा आकाश को छूने चल दिया और उसी के साथसाथ मेरा विश्वास भी आसमान छू रहा था.

मैं अपनी मूर्खता पर एक बार फिर गर्वित था और सोच रहा था कि इस नश्वर संसार को चलाने वाला कोई भगवान नहीं हमारा विश्वास ही है।
 
Money spent for education of lesser privilege amongst the youth always has unexpectedly very high returns..

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
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जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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।। सुंदर कहानी ।।

|| तुलसीदल का महात्म्य ||


पद्मपुराण में भगवान शिव द्वारा
  तुलसीदल की महिमा का वर्णन:-

भगवान शिव ने स्वयं कहा है:- सब प्रकार के पत्तों और पुष्पों की अपेक्षा तुलसी ही श्रेष्ठ मानी गई है।






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तुलसी परम मंगलमयी,समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली,शुद्ध, श्रीविष्णु को अत्यंत प्रिय तथा ‘वैष्णवी’ नाम धारण करने वाली है। 

तुलसी संपूर्ण लोक में श्रेष्ठ, शुभ तथा भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली है।

भगवान श्रीविष्णु ने पूर्वकाल में संपूर्ण लोकों का हित करने के लिए तुलसी का वृक्ष रोपा था।

तुलसी के पत्ते और पुष्प सब धर्मों में प्रतिष्ठित हैं, जैसे भगवान श्रीविष्णु को लक्ष्मी और मैं ( शिव ) दोनों प्रिय हैं, उसी प्रकार यह तुलसीदेवी भी परम प्रिय है।

हम तीनों के सिवा कोई चौथा ऐसा नहीं जान पड़ता, जो भगवान को इतना प्रिय हो।

तुलसीदल के बिना दूसरे-दूसरे फूलों, पत्तों तथा चंदन आदि के लेपों से भगवान श्रीविष्णु को उतना संतोष नहीं होता। 

जिसने तुलसीदल के द्वारा पूर्ण श्रद्धा के साथ प्रतिदिन भगवान श्रीविष्णु का पूजन किया है, उसने दान, होम, यज्ञ और व्रत आदि सब पूर्ण कर लिए।

तुलसीदल से भगवान की पूजा कर लेने पर कांति, सुख, भोग सामग्री, यश, लक्ष्मी, श्रेष्ठ कुल, शील, पत्नी, पुत्र, कन्या, धन, राज्य, आरोग्य, ज्ञान, विज्ञान, वेद, वेदंग, शास्त्र, पुराण, तंत्र और संहिता सबकुछ मैं ( शिव ) करतलगत समझता हूं।

जैसे पुण्यसलिला गंगामुक्ति प्रदान करने वाली हैं, उसी प्रकार यह तुलसी भी कल्याण करने वाली है।

यदि मंजरी युक्त तुलसी पत्रों के द्वारा भगवान श्रीविष्णु की पूजा की जाय तो उसके पुण्यफल का वर्णन करना असंभव है।

जहां तुलसी का वन है, वहीं भगवान कृष्ण की समीपता है तथा वहीं ब्रह्मा और लक्ष्मी जी भी संपूर्ण देवताओं के साथ विराजमान हैं।

इसलिए अपने निकटवर्ती स्थान में तुलसीदेवी को रोपकर उनकी पूजा करनी चाहिए।

तुलसी के निकट जो स्तोत्र-मंत्र आदि का जप किया जाता है, वह सब अनंतगुना फल देनेवाला होता है।

प्रेत, पिशाच, कूष्मांड,ब्रह्म राक्षस, भूत और दैत्य आदि सब तुलसी के वृक्ष से दूर भागते हैं।

ब्रह्महत्या आदि पाप तथा खोटे विचार से उत्पन्न होने वाले रोग ये सब तुलसीवृक्ष के समीप नष्ट हो जाते हैं।

जिसने श्रीभगवान की पूजा के लिए पृथ्वी पर तुलसी का बगीचा लगा रखा है, उसने उत्तम दक्षिणाओं से युक्त सौ यज्ञों का विधिवत अनुष्ठान पूर्ण कर लिया है।

जो श्रीभगवान की प्रतिमाओं तथा शालग्राम- शिलाओं पर चढ़े हुए तुलसीदल को प्रसाद के रूप में ग्रहण करता है, वह श्रीविष्णु के सायुज्य को प्राप्त होता है।

जो श्रीहरि की पूजा करके उन्हें निवेदन किए हुए तुलसीदल को अपने मस्तक पर धारण करता है, वह पाप से शुद्ध होकर स्वर्गलोक को प्राप्त होता है।

कलियुग में तुलसी का पूजन,कीर्तन, ध्यान, रोपण और धारण करने से वह पाप को जलाती और स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करती है।

जो तुलसी के पूजन आदि का दूसरों को उपदेश देता और स्वयं भी आचरण करता है, वह भगवान श्री लक्ष्मी पति के परमधाम को प्राप्त होता है।

जो वस्तु भगवान श्रीविष्णु को प्रिय जा पड़ती है, वह मुझे भी अत्यंत प्रिय है।

श्राद्ध और यज्ञ आदि कार्यों में तुलसी का एक पत्ता भी महान पुण्य प्रदान करने वाला है।

जिसने तुलसी की सेवा की है, उसने गुरु, ब्राह्मण, देवता और तीर्थ सबका भली भांति सेवन कर लिया।

जो शिखा में तुलसी स्थापित करके प्राणों का परित्याग करता है, वह पापराशि से मुक्त हो जाता है।

राजसूय आदि यज्ञ, भांति - भांति के व्रत तथा संयम के द्वारा धीर पुरुष जिस गति को प्राप्त करता है, वही उसे तुलसी की सेवा मिल जाती है।

तुलसी के एक पत्र से श्रीहरि की पूजा करके मनुष्य वैष्णवत्व को प्राप्त होता है, उसके लिए अन्यान्य शास्त्रों के विस्तार की क्या आवश्यकता है।

जिसने तुलसी की शाखा तथा कोमल पत्तियों से भगवान श्रीविष्णु की पूजा की है, वह कभी माता का दूध नहीं पीता अर्थात् उसका पुनर्जन्म नहीं होता।

कोमल तुलसीदलों के द्वारा प्रतिदिन श्रीहरि की पूजा करके मनुष्य अपनी सैकड़ों और हजारों पीढ़ियों को पवित्र कर सकता है।

ये तुलसी के प्रधान- प्रधान गुण हैं, तुलसी के संपूर्ण गुणों का वर्णन तो बहुत अधिक समय लगाने पर भी नहीं हो सकता।

            || तुलसी महारानी की जय हो ||





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ठक ठक तो होती ही रहेगी :


एक आदमी घोड़े पर कहीं जा रहा था। 

घोड़े को जोर की प्यास लगी थी।

दूर कुएं पर एक किसान बैलों से रहट चलाकर खेतों में पानी लगा रहा था। 

मुसाफिर कुएं पर आया और घोड़े को "रहट" में से पानी पिलाने लगा।

पर जैसे ही घोड़ा झुककर पानी पीने की कोशिश करता, "रहट" की ठक - ठक की आवाज से डर कर पीछे हट जाता।






फिर आगे बढ़कर पानी पीने की कोशिश करता और फिर "रहट" की ठक - ठक से डरकर हट जाता।

मुसाफिर कुछ क्षण तो यह देखता रहा,फिर उसने किसान से कहा कि थोड़ी देर के लिए अपने बैलों को रोक ले ताकि रहट की ठक - ठक बन्द हो और घोड़ा पानी पी सके।

किसान ने कहा कि जैसे ही बैल रूकेंगे कुएँ में से पानी आना बन्द हो जायेगा।

इस लिए पानी तो इसे ठक - ठक में ही पीना पड़ेगा।

ठीक ऐसे ही यदि हम सोचें कि जीवन की ठक - ठक ( आपा धापी ) बन्द हो तभी हम भजन, सन्ध्या,वन्दना आदि करेंगे तो यह हमारी भूल है।

हमें भी जीवन की इस ठक - ठक ( आपा धापी ) में से ही समय निकालना होगा तभी हम अपने मन की तृप्ति कर सकेंगे,वरना उस घोड़े की तरह हमेशा प्यासा ही रहना होगा।

सब काम करते हुए,सब दायित्व निभाते हुए प्रभु सुमिरन में भी लगे रहना होगा।

ठक - ठक तो चलती ही रहेगी।
       *🙏जय श्री कृष्ण🙏*






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।। सुंदर कहानी ।।*"नियम का महत्व"*

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
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*"नियम का महत्व"*

         एक संत थे। एक दिन वे एक जाट के घर गए। जाट ने उनकी बड़ी सेवा की। सन्त ने उसे कहा कि रोजाना नाम -जप करने का कुछ नियम ले लो। जाट ने कहा बाबा, हमारे को वक्त नहीं मिलता। सन्त ने कहा कि अच्छा, रोजाना ठाकुर जी की मूर्ति के दर्शन कर आया करो। जाट ने कहा मैं तो खेत में रहता हूँ और ठाकुर जी की मूर्ति गाँव के मंदिर में है, कैसे करूँ ? 

         संत ने उसे कई साधन बताये, कि वह कुछ-न-कुछ नियम ले लें। पर वह यही कहता रहा कि मेरे से यह बनेगा नहीं, मैं खेत में काम करूँ या माला लेकर जप करूँ। इतना समय मेरे पास कहाँ है ? बाल-बच्चों का पालन पोषण करना है। आपके जैसे बाबा जी थोड़े ही हूँ। कि बैठकर भजन करूँ। संत ने कहा कि अच्छा तू क्या कर सकता है ? जाट बोला कि पड़ोस में एक कुम्हार रहता है। उसके साथ मेरी मित्रता है। उसके और मेरे खेत भी पास-पास हैं, और घर भी पास-पास है। रोजाना एक बार उसको देख लिया करूँगा। सन्त ने कहा कि ठीक है, उसको देखे बिना भोजन मत करना। जाट ने स्वीकार कर लिया। जब उसकी पत्नी कहती कि भोजन कर लो। तो वह चट बाड़ पर चढ़कर कुम्हार को देख लेता। और भोजन कर लेता। इस नियम में वह पक्का रहा। 
          एक दिन जाट को खेत में जल्दी जाना था। इसलिए भोजन जल्दी तैयार कर लिया। उसने बाड़ पर चढ़कर देखा तो कुम्हार दीखा नहीं। पूछने पर पता लगा कि वह तो मिट्टी खोदने बाहर गया है। जाट बोला कि कहाँ मर गया, कम से कम देख तो लेता। अब जाट उसको देखने के लिए तेजी से भागा। उधर कुम्हार को मिट्टी खोदते-खोदते एक हाँडी मिल गई। जिसमें तरह-तरह के रत्न, अशर्फियाँ भरी हुई थीं। उसके मन में आया कि कोई देख लेगा तो मुश्किल हो जायेगी। अतः वह देखने के लिए ऊपर चढा तो सामने वह जाट आ गया।

          कुम्हार को देखते ही जाट वापस भागा। तो कुम्हार ने समझा कि उसने वह हाँडी देख ली। और अब वह आफत पैदा करेगा। कुम्हार ने उसे रूकने के लिए आवाज लगाई। जाट बोला कि बस देख लिया, देख लिया। कुम्हार बोला कि अच्छा, देख लिया तो आधा तेरा आधा मेरा, पर किसी से कहना मत। 

         जाट वापस आया तो उसको धन मिल गया। उसके मन में विचार आया कि संत से अपना मनचाहा नियम लेने में इतनी बात है। अगर सदा उनकी आज्ञा का पालन करूँ तो कितना लाभ है। ऐसा विचार करके वह जाट और उसका मित्र कुम्हार दोनों ही भगवान् के भक्त बन गए।

         *तात्पर्य यह है कि हम दृढता से अपना एक उद्देश्य बना ले, नियम ले लें तो वह भी हमारी डुबती किश्ती पार लगा सकता है।*

    सभी का दिन शुभ हो!🌹
🙏🙏🙏【【【【【{{{{ (((( मेरा पोस्ट पर होने वाली ऐडवताइस के ऊपर होने वाली इनकम का 50 % के आसपास का भाग पशु पक्षी ओर जनकल्याण धार्मिक कार्यो में किया जाता है.... जय जय परशुरामजी ))))) }}}}}】】】】】🙏🙏🙏

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ध्यान न लगे, तो क्या करें ?

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ध्यान न लगे, तो क्या करें ?


एक बार कबीर दास जी के पास एक साधक आया *अथाह विचलित! 

मन की उदासी उसके चेहरे पर भी साफ़ मुखर थी* मुरझाया- सा मुंह लेकर गुरु को प्रणाम कर वहीं बैठ गया





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कबीर दास जी ने शिष्य की और अपनी दृष्टि घुमाई* और उससे उसकी मायूसी का कारण पूछा!

*साधक -* गुरुदेव! आपने मुझे ब्रह्मज्ञान की महान ध्यान- साधना दी *लेकिन मै क्या करूं महाराज, बहुत प्रयास करने पर भी मै ध्यान नहीं लगा पाता?* 

न जाने कैसे कर्म- संस्कारों को अपने संग जमा कर लाया हूं, कि *आंख मूंदते ही मन विचारों की गलियों में दौड़ने लगता है* मै चाहकर भी इस मन को टिका नहीं पाता! मै क्या करूं?

कबीर दास जी -* दुःखी मत हो वत्स! चलो *मै तुम्हें इस समस्या के समाधान हेतु आज एक उपाय बताता हूं* जब भी तुम्हारा चंचल मन ध्यान में टिकने से इंकार करे, तो इस सूत्र का सहारा ले लिया करो-

*' ध्यानमूलं गुर्रोर्मुति:'!*

अर्थात् आंखे मूंदकर सर्वप्रथम गुरु की मूर्ति का ध्यान किया करो *उनके दिव्य स्वरूप की आभा में मन रमाते हुए* ध्यान की गहराईओ में उतर जाओ!

साधक हाथ जोड़कर--* जी गुरुदेव! *आपके वचनानुसार प्रयास करूंगा* परन्तु यदि चंचल मन तब भी न टिक पाया, तो मै क्या करूं?

कबीर दास जी -* तब फ़िर तुम गुरु के श्री चरणों में ध्यान लगाना गुरु के चरण- कमलों में आराधना का मूल समाया हैं-





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' पूजा मूलं गुरोर्पदम् '!*

साधक -* मै पूरा प्रयत्न करूंगा *पर मुझे क्षमा करें गुरुदेव... मै इस हठी मन के स्वभाव को भली- भांति जानता हूं* यदि तब भी इस मन ने ढीटता न छोड़ी, तो मै क्या करूं?

कबीर दास जी -* यदि तब भी मन न लगे, तो फ़िर तुम उन दिव्य वचनों को स्मरण करना *जो तुम्हारे गुरु ने तुमसे कहे हो* क्योंकि गुरु के वचन महामंत्र हुआ करते हैं-

' मंत्र मूलं गुरोर्वाक्यं '!

उनका चिंतन मन को नियंत्रित करने में अत्यंत सहायक होता हैं

साधक के चेहरे पर से उदासी के बादल काफ़ी हद तक छंट चुके थे* किन्तु अब भी निश्चिंतता का सूर्य पूरी तरह उदित नहीं हुआ था *वह याचना भरे स्वर में बोला*-- मै जानता हूं, यूं बार- बार पूछना धृष्टता ही होगी! 

लेकिन इस पर भी यदि मेरे मन ने कोई चाल चली* तब मै क्या करूंगा, महाराज?'




कबीर दास जी बुलंद स्वर में ऐलान कर उठे --* तब फ़िर एक ब्रह्मास्त्र चला देना!

साधक -* कौन सा ब्रह्मास्त्र, प्रभु?

कबीर दास जी -* हुं! तुम अपने मन को उन पलो की याद में भिगो देना *जब- जब गुरु ने तुम पर कृपा की* तुम्हें सहारा दिया! 

इस सूत्र को सदैव याद रखना कि *गुरु की कृपा ही मोक्ष का मूल है-*

*' मोक्ष मूलं गुरोर्कृपा '!*

*और ध्यान मोक्ष की सीढ़ी है*

अत: ध्यान का आधार केवल और केवल गुरु की कृपा ही है-




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*' गुरुकृपा हि केवलम् '!*

इसलिए उनसे उनकी कृपा के लिए प्रार्थना करना

साधक आशा व नवीन उत्साह के साथ--* सत्य वचन, महाराज! सत्य वचन! *इन ४ ब्रह्मास्त्रों के बल पर मै निश्चित ही विजयी होऊंगा*

||अच्छाई पलट-पलट कर आती रहती है || 

ब्रिटेन के स्कॉटलैंड में फ्लेमिंग नाम का एक गरीब किसान था। एक दिन वह अपने खेत पर काम कर रहा था। 

अचानक पास में से किसी के चीखने की आवाज सुनाई पड़ी । 

किसान ने अपना साजो सामान व औजार फेंका और तेजी से आवाज की तरफ लपका। 

आवाज की दिशा में जाने पर उसने देखा कि एक बच्चा दलदल में डूब रहा था । 

वह बालक कमर तक कीचड़ में फंसा हुआ बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रहा था। 

वह डर के मारे बुरी तरह कांप पर रहा था और चिल्ला रहा था।

किसान ने आनन-फानन में लंबी टहनी ढूंढी। 

अपनी जान पर खेलकर उस टहनी के सहारे बच्चे को बाहर निकाला।

अगले दिन उस किसान की छोटी सी झोपड़ी के सामने एक शानदार गाड़ी आकर खड़ी हुई।

उसमें से कीमती वस्त्र पहने हुए एक सज्जन उतरे ।

उन्होंने किसान को अपना परिचय देते हुए कहा- मैं उस बालक का पिता हूं और मेरा नाम राँडॉल्फ चर्चिल है।

फिर उस अमीर राँडाल्फ चर्चिल ने कहा कि वह इस एहसान का बदला चुकाने आए हैं।

फ्लेमिंग नामक उस किसान ने उन सज्जन के ऑफर को ठुकरा दिया ।

उसने कहा, मैंने जो कुछ किया उसके बदले में कोई पैसा नहीं लूंगा। 

किसी को बचाना मेरा कर्तव्य है, मानवता है, इंसानियत है और उस मानवता इंसानियत का कोई मोल नहीं होता ।

इसी बीच फ्लेमिंग का बेटा झोपड़ी के दरवाजे पर आया। 

उस अमीर सज्जन की नजर अचानक उस पर गई तो उसे एक विचार सूझा।

उसने पूछा - क्या यह आपका बेटा है ?

किसान ने गर्व से कहा- हां यह मेरा बेटा है !





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उस व्यक्ति ने अब नए सिरे से बात शुरू करते हुए किसान से कहा- ठीक है अगर आपको मेरी कीमत मंजूर नहीं है तो ऐसा करते हैं कि आपके बेटे की शिक्षा का भार मैं अपने ऊपर लेता हूं । 

मैं उसे उसी स्तर की शिक्षा दिलवाने की व्यवस्था करूंगा जो अपने बेटे को दिलवा रहा हूं।

फिर आपका बेटा आगे चलकर एक ऐसा इंसान बनेगा,जिस पर हम दोनों गर्व महसूस करेंगे।"

किसान ने सोचा मैं तो अपने पुत्र को उच्च शिक्षा दिला पाऊंगा नहीं और ना ही सारी सुविधाएं जुटा पाऊंगा, जिससे कि यह बड़ा आदमी बन सके ।

अतः इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता हूँ।

बच्चे के भविष्य की खातिर फ्लेमिंग तैयार हो गया ।

अब फ्लेमिंग के बेटे को सर्वश्रेष्ठ स्कूल में पढ़ने का मौका मिला।

आगे बढ़ते हुए उसने लंदन के प्रतिष्ठित सेंट मेरीज मेडिकल स्कूल से स्नातक डिग्री हासिल की।

फिर किसान का यही बेटा पूरी दुनिया में पेनिसिलिन का आविष्कारक महान वैज्ञानिक सर अलेक्जेंडर फ्लेमिंग के नाम से विख्यात हुआ।

लेकिन-

यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती! कुछ वर्षों बाद, उस अमीर के बेटे को निमोनिया हो गया और उसकी जान सर अलेक्जेंडर फ्लेमिंग द्वारा बनाए गए पेनिसिलीन के इंजेक्शन से ही बची।

उस अमीर चर्चिल के बेटे का नाम था- विंस्टन चर्चिल,जो दो बार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे !

हैं न आश्चर्यजनक संजोग।इसलिए ही कहते हैं कि व्यक्ति को हमेशा अच्छे काम करते रहना चाहिए। 

क्योंकि आपका किया हुआ काम आखिरकार लौटकर आपके ही पास आता है ! 

यानी अच्छाई पलट - पलट कर आती रहती है!

यकीन मानिए मानवता की दिशा में उठाया गया प्रत्येक कदम आपकी स्वयं की चिंताओं को कम करने में मील का पत्थर साबित होगा ।

🙏🙏राम राम राम 

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

।। सुंदर कहानी ।।एक बार मुगल बादशाह शाहजहाँ

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। सुंदर कहानी ।।

एक बार मुगल बादशाह शाहजहाँ ने दिल्ली में एक विराट मुशायरे का आयोजन किया।
उसमे मुस्लिम ही नही अपितु हिन्दू कवियों ने भी भाग लिया।
सर्वप्रथम गजलों एवं शेरों-सायरी का कार्यक्रम हुआ,पश्चात"समस्या-पूर्ति"का।

'समस्या-पूर्ति में कोई कवि स्व रचित एक पंक्ति अन्य कवियों को सुनाता हैं तथा उनसे उस पंक्ति से सन्दर्भ जमाते हुए अन्य पंक्तियाँ कहने का आह्वान करता हैं।

एक मुस्लिम कवि ने'समस्या-पूर्ति' के लिए निम्न पंक्ति कही-
"काफ़िर हैं वो दुनिया में ,जो बंदे नही इस्लाम के"।
स्पष्ट रूप से संकेत हिंदूओ की ओर था। 
और उन्हें ही समस्या का समाधान करना था।
पंक्ति सुनकर जहाँ मुस्लिम कवियो में ख़ुशी की लहर फैल गई,वही हिन्दू कुछ दुविधा में पड़ गये। उनके द्वारा समस्या-पूर्ति न करने से इस्लाम धर्म के अनुयायी न होने से वे काफ़िर सिद्ध होते थे। 
ये जानबूझ कर किया गया अपमान था।

कुछ हिन्दू कवि मन ही मन 
बौ खला गये,तो कुछ निषेध हेतु मंच का त्याग करने को उद्घत ही थे कि कवि जगन्नाथ पंडित उठ खड़े हुए और ऊँचे स्वर में बोले--

"इस "लाम"के मानिंद हैं,गेसू मेरे घनश्याम के।
काफ़िर हैं वो दुनिया में,जो बंदे नही इस 'लाम' के।।

यह सुनते ही उपस्थित हिन्दू जनसमूह ने बेहद प्रसन्न होकर तालियाँ बजना आरंभ कर दिया,क्योंकि पासा पलट गया था और उस मुस्लिम कवि को लेने के देने पड़ गये थे।

उपर्युक्त पंक्ति का भावार्थ निम्न था-"मेरे कृष्ण के बाल (गेसू) उर्दू अक्षर 'लाम 'की तरह तिरछे हैं। इस दुनिया में उनके इन बालों के जो भक्त नही,वे काफ़िर हैं।"
श्री कृष्ण के घुँघराले बाल हैं और उर्दू के अक्षर लाम का आकार घुँघराले बालों जैसा ही होता हैं।"
जय श्री कृष्ण....!!!!
🙏🙏🙏【【【【【{{{{ (((( मेरा पोस्ट पर होने वाली ऐडवताइस के ऊपर होने वाली इनकम का 50 % के आसपास का भाग पशु पक्षी ओर जनकल्याण धार्मिक कार्यो में किया जाता है.... जय जय परशुरामजी ))))) }}}}}】】】】】🙏🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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-: 25 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
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💐💐शिकंजी का स्वाद 💐💐

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

*💐💐शिकंजी का स्वाद*💐💐

एक प्रोफ़ेसर क्लास ले रहे थे,क्लास के सभी छात्र बड़ी ही रूचि से उनके लेक्चर को सुन रहे थे.।

उनके पूछे गये सवालों के जवाब दे रहे थे. लेकिन उन छात्रों के बीच कक्षा में एक छात्र ऐसा भी था, जो चुपचाप और गुमसुम बैठा हुआ था.।

प्रोफ़ेसर ने पहले ही दिन उस छात्र को नोटिस कर लिया, लेकिन कुछ नहीं बोले. लेकिन जब ४-५ दिन तक ऐसा ही चला, तो उन्होंने उस छात्र को क्लास के बाद अपने केबिन में बुलवाया और पूछा, “तुम हर समय उदास रहते हो।





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क्लास में अकेले और चुपचाप बैठे रहते हो,लेक्चर पर भी ध्यान नहीं देते, क्या बात है? 

कुछ परेशानी है क्या?”

सर, वो…..!” 

छात्र कुछ हिचकिचाते हुए बोला, “…. मेरे अतीत में कुछ ऐसा हुआ है, जिसकी वजह से मैं परेशान रहता हूँ।

समझ नहीं आता क्या करूं?”

प्रोफ़ेसर भले व्यक्ति थे. उन्होंने उस छात्र को शाम को अपने घर पर बुलवाया।

शाम को जब छात्र प्रोफ़ेसर के घर पहुँचा, तो प्रोफ़ेसर ने उसे अंदर बुलाकर बैठाया।

फिर स्वयं किचन में चले गये और शिकंजी बनाने लगे. उन्होंने जानबूझकर शिकंजी में ज्यादा नमक डाल दिया।

फिर किचन से बाहर आकर शिकंजी का गिलास छात्र को देकर कहा, “ये लो, शिकंजी पियो।”

छात्र ने गिलास हाथ में लेकर जैसे ही एक घूंट लिया, अधिक नमक के स्वाद के कारण उसका मुँह अजीब सा बन गया।

यह देख प्रोफ़ेसर ने पूछा, “क्या हुआ? शिकंजी पसंद नहीं आई?”

“नहीं सर, ऐसी बात नहीं है. बस शिकंजी में नमक थोड़ा ज्यादा है.” छात्र बोला।

“अरे, अब तो ये बेकार हो गया,लाओ गिलास मुझे दो,मैं इसे फेंक देता हूँ।"

 प्रोफ़ेसर ने छात्र से गिलास लेने के लिए अपना हाथ बढ़ाया. लेकिन छात्र ने मना करते हुए कहा, “नहीं सर, बस नमक ही तो ज्यादा है. थोड़ी चीनी और मिलायेंगे, तो स्वाद ठीक हो जायेगा.”

यह बात सुन प्रोफ़ेसर गंभीर हो गए और बोले, “सही कहा तुमने. 

अब इसे समझ भी जाओ. ये शिकंजी तुम्हारी जिंदगी है. इसमें घुला अधिक नमक तुम्हारे अतीत के बुरे अनुभव है. जैसे नमक को शिकंजी से बाहर नहीं निकाल सकते, वैसे ही उन बुरे अनुभवों को भी जीवन से अलग नहीं कर सकते....!




वे बुरे अनुभव भी जीवन का हिस्सा ही हैं. 

लेकिन जिस तरह हम चीनी घोलकर शिकंजी का स्वाद बदल सकते हैं.

वैसे ही बुरे अनुभवों को भूलने के लिए जीवन में मिठास तो घोलनी पड़ेगी ना. 

इस लिए मैं चाहता हूँ कि तुम अब अपने जीवन में मिठास घोलो.”

प्रोफ़ेसर की बात छात्र समझ गया और उसने निश्चय किया कि अब वह बीती बातों से परेशान नहीं होगा.

सीख – जीवन में अक्सर हम अतीत की बुरी यादों और अनुभवों को याद कर दु:खी होते रहते हैं. इस तरह हम अपने वर्तमान पर ध्यान नहीं दे पाते और कहीं न कहीं अपना भविष्य बिगाड़ लेते हैं. जो हो चुका, उसे सुधारा नहीं जा सकता।

लेकिन कम से कम उसे भुलाया तो जा सकता है और उन्हें भुलाने के लिए नई मीठी यादें हमें आज बनानी होगी।

जीवन में मीठे और ख़ुशनुमा लम्हों को लाइये, तभी तो जीवन में मिठास आयेगी।

*सदैव प्रसन्न रहिये!!*

*जय श्री कृष्ण...! जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!*






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|| श्रीमद् भागवत रहस्य-||


यशोदाजी कन्हैया को डाँटने लगी। घर में तुझे खाने को नहीं मिलता है क्या ? 

महाराज की खीर क्यों खाई?

कन्हैया बोले-तू मुझे डाँट रही है,किन्तु मै क्या करू? 

महाराज ने ही तो मुझे खीर खाने बुलाया था। 

गर्गाचार्य बोले- मैंने तो वैकुंठवासी नारायण को बुलाया था। 

कन्हैया कहता है-मै ही तो हूँ वह वैकुंठवासी नारायण।

यशोदाजी कहती है-ऐसा नहीं बोलते। 

तू कहाँ का नारायण हो गया? 

वैंकुंठ के नारायण के तो चार हाथ है, तेरे कहाँ चार हाथ है?

कन्हैया कहता है-माँ यदि तू कहे तो मै चतुर्भुज हो जाऊँ।

यशोदाजी ने सोचा कि यदि इसने चतुर्भुज का रूप धारण कर दिया तो लोग मानेंगे कि यह लड़का यशोदा का नहीं है। 

+++ +++

कोई जादूगर है। 

सो उन्होंने कहा -नहीं,नहीं। 

चार हाथो वाले नारायण की अपेक्षा मेरा दो हाथों वाला मुरलीधर अच्छा है। 

तू जो है वही रहना।

फिर यशोदाजी ने गर्गाचार्य से कहा -यह लड़का नादान है इसकी बातों में न आना। 

कृपा करके आप फिर से खीर बना लीजिए। 

महाराज फिर स्नान करने यमुना की ओर चल दिए। 

लाला यशोदा की गोद में बैठकर कहने लगा, माँ,मै कोयल जैसा बोल सकता हूँ। 

और कुहू कुहू करने लगा। 

उसका कंठ इतना मीठा है कि मोर भी आकर नाचने लगा। 

कन्हैया माँ से कहने लगा,माँ, मै भी मोर की तरह नाच सकता हूँ और वह ठुमक-ठुमक नाचने लगा।

यशोदा-बेटा तूने यह नाचना किससे सीखा है?

कन्हैया माँ,मै तो तेरे पेट में से सीख कर आया हूँ।

यह कन्हैया का गुरु कोई नहीं हो सकता। 

वह सबका गुरु है। 

कृष्ण वन्दे जगदगुरुम!

महाराज ने फिरसे खीर बनाकर ठंडी की है। 

इस तरफ लाला ने मज़ाक किया। 

जाकर माँ की गोद में सो गया। 

यशोदाजी सोचती है कि अब लाला सो गया है तो महाराज आराम से भोजन कर सकेंगे। 

गर्गाचार्य ने खीर पर तुलसीदल बिखेरा और प्रार्थना करने लगे - नाथ, आपका सेवक हूँ।

हे नारायण,लक्ष्मीपति आप शीघ्र पधारिये और मेरी खीर का प्राशन कीजिये।

कन्हैया ने यह सुना तो जाने के लिए अधीर हो गया, उसने योगमाया को यशोदा की आँखोंमें जा बसने की आज्ञा दी। 

यशोदा की आँखे नींद से भरी नहीं कि -कन्हैया दौड़ता हुआ गंगाचार्य के पास आया और खीर खाने लगा। 

गर्गाचार्य ने देखा। 

अरे! यह वैश्य बालक ने तो फिर से मेरी खीर झूठी कर दी। 

कन्हैया ने सोचा कि -बेचारे इस ब्राह्मण को मै कब तक भरमाता रहू। 

उसने अपना चतुर्भुज स्वरुप प्रकट किया। 

महाराज,आप जिस नारायण की आराधना कर रहे हो,वह मै ही हूँ और गोकुल में कन्हैया का रूप लेकर अवतरित हुआ हूँ।

आपकी तपश्चर्या सफल हुई।

गर्गाचार्य ने सानन्द दर्शन किया और अति-प्रेम से स्तब्ध से हो गए। 

आंखोमे आंसू भर आये है।

वे सोचने लगे, कितना अच्छा हो यदि प्रभु मेरी गोद में आ बैठे। 

कन्हैया गर्गाचार्य की गोद में बैठ गया और कहने लगा,महाराज अब आप भोजन कीजिए। 

गर्गाचार्य- जब मेरे इष्टदेव ही मेरे मुँह में कौर रखेंगे,तभी मै खाऊँगा।

            || जय श्री कृष्ण जी ||

+++ +++

|| श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं ||


गोपियो ! 

तुमने मेरे लिये गृह की उन कठिन बेड़ियों को तोड़ डाला है, जिन्हें तोड़ना बहुत ही कठिन है | 

तुम्हारा यह आत्ममिलन निर्मल-निर्दोष है | 

मैं देवताओं की आयु में भी तुम्हारा ऋण नहीं चुका सकता | 

तुम अपने सौम्य स्वभाव से ही मुझे ऋण मुक्त कर सकती हो |

     (श्रीमदभा. 10/32/22)

जीव कितनी भी उत्कृष्ट सुदुर्लभ वस्तु, स्थिति, मति या गति चाहे या प्राप्त करे, श्रीकृष्ण प्रेमधन के साथ किसी की भी, किसी अंश में भी तुलना नहीं हो सकती!

(श्रीराधा-माधाव-चिन्तन)
  पेज 643 पुस्तक कोड 49 गीताप्रेस)

कृष्ण की संगति में मन अपने
  दर्द का अर्थ समझने लगता है।

दर्द हर किसी के जीवन में आता है,लेकिन उसका अर्थ हर कोई नहीं समझ पाता।

कृष्ण से जुड़ने वाला व्यक्ति अपने दर्द को केवल भावनात्मक बोझ नहीं मानता वह उसे जीवन का संदेश समझता है। 

कृष्ण मन को यह सिखाते हैं कि दर्द कोई दंड नहीं, बल्कि परिवर्तन का संकेत है।

यह संकेत है कि भीतर कुछ नया जन्म लेने वाला है, कुछ नया समझ में आने वाला है।

कान्हा की संगति में मन उस दर्द को स्वीकारना सीखता है, उससे डरना नहीं।

धीरे - धीरे वह समझने लगता है कि जो भी हुआ, वह किसी दिव्य योजना का हिस्सा था।

कृष्ण का प्रेम दर्द को कम नहीं करता,वह व्यक्ति को इतना मजबूत बनाता है कि वह दर्द को प्रेम से देख सके।

दुख में भी व्यक्ति को उम्मीद दिखाई देने लगती है।

जो कभी घाव लगता था, वही आगे चलकर चमक बन जाता है।

कृष्ण कहते हैं—

हर दर्द में मैंने तुझे अपने पास बुलाया है।

और यह समझ आते ही मन हल्का हो जाता है।

           || जय श्री कृष्ण जी ||

!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

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मासिक दुर्गाष्टमी

मासिक दुर्गाष्टमी : मासिक दुर्गाष्टमी हिंदू धर्म में एक विशेष पर्व है जो हर महीने शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है।  यह पर्व देवी ...