श्रीमद्भागवत कथा — सखियों के श्याम:
श्रीमद्भागवत कथा — सखियों के श्याम :
श्रीहरिः - ( प्रीत किये दुख होत ) ;
श्रीकृष्ण के साथ प्रेम करना जितना मधुर है, उसी प्रेम में विरह का अनुभव उतना ही गहरा है।
श्रीमद्भागवत में व्रज की गोपियों का कृष्ण-प्रेम साधारण लौकिक प्रेम के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।
किंतु फिर भी इतना कुछ सुनकर भी श्यामसुंदर वैसे ही शिलापर बैठे मुस्कराते रहे ।
मल्लिकाके सुमन झरकर उनकी अलकों में उलझ रहे थे ।
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शुकदेवजी जिस प्रकार गोपियों की स्थिति का वर्णन करते हैं, उससे स्पष्ट होता है कि उनका मन, वाणी और जीवन श्रीकृष्ण में पूर्णतः समर्पित हो चुका था।
हमारी धूमिल आशा अब श्रीकिशोरीजीके चरणोंसे जा लगी।
सबके झुके मुखोंकी अश्रुरुध्द—
धुंधलाई दृष्टिके सम्मुख अंधकार अधिपत्य जमाने लगा था।
अन्तरको मानो गर्म लोहेसे दागा जा रहा हो; तभी श्रीकिशोरीजीका स्वर सुनाई पड़ा —
'हम तुम्हारी दासी है श्यामसुंदर!
हमारा.... उपहास.... तुम्हारे.... योग्य.... कार्य.... नहीं .... ।'
दशम स्कंध के सैंतालीसवें अध्याय में जब श्रीकृष्ण के संदेशवाहक उद्धव व्रज में आते हैं, तब गोपियाँ उन्हें देखकर श्रीकृष्ण की स्मृति में डूब जाती हैं।
उद्धव का रूप, पीतवस्त्र और आभूषण उन्हें श्रीकृष्ण की याद दिलाते हैं।
वे उन्हें घेर लेती हैं और समझ जाती हैं कि वे यदुपति श्रीकृष्ण के संदेश लेकर आए हैं।
भरे कंठसे वे रुक-रुककर बड़ी कठिनाईसे बोल रही थी 'हमारा धर्म... —
ज्ञान .......–रीति......-लोक...... -परलोक; .... सब....कुछ... तुम्ही .... हो।
तुम्ही..... बताओ!..... तुम्हारे.... ये.... अरुण... अमल... पदाम्बुज....... छोडकर ....हम...... कहाँ..... जायं ?
यहीं से उस प्रेम की वह गहराई सामने आती है जिसे केवल सांसारिक दृष्टि से समझना संभव नहीं।
प्रेम का अर्थ अधिकार नहीं, समर्पण है
गोपियों की स्थिति को समझने के लिए श्रीमद्भागवत के शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
शुकदेवजी कहते हैं—
“इति गोप्यो हि गोविन्दे गतवाक्-काय-मानसाः ।
कृष्णदूते समायाते उद्धवे त्यक्तलौकिकाः ॥”
— श्रीमद्भागवत, दशम स्कंध, 47.9
अर्थात् गोपियों की वाणी, शरीर और मन गोविन्द में ही स्थित हो चुके थे।
उद्धव के आने पर वे सामान्य लौकिक व्यवहार से ऊपर उठकर कृष्ण - स्मरण में निमग्न हो गईं।
यही “सखियों के श्याम” का वास्तविक अर्थ है।
श्याम उनके लिए केवल किसी प्रिय व्यक्ति का नाम नहीं है।
वे अपने जीवन का केन्द्र श्रीकृष्ण में देखती हैं।
इस लिए कृष्ण की अनुपस्थिति उनके लिए केवल किसी प्रिय के दूर चले जाने का दुःख नहीं, बल्कि निरंतर स्मरण की अग्नि बन जाती है।
इसी लिए उनके प्रेम में एक ओर मधुरता है और दूसरी ओर विरह की तीव्रता।
..... तुम्ही.... बताओ!
....तुमसे ....बड़ा .....धर्म... कौन.... सा..... है ?
.... तुम्हारी.... लीलाओं से... तुम्हारे...... रूपसे... तुम्हारी..... हँसी.... और.... मीठी.... वाणीसे .....तुम्हारे.... बल... और.... गौरवसे.... तुम्हारे.... स्नेहिल..... स्वभावसे..... वशमें..... हुई..... हम.... अबलायें.... अब.... कहाँ..... जायें ?
...... क्या... तुम... मात्र.... व्रजराजकुमार...... ही..... हो ?'
'और बहिन वह चितचोर शिलातलसे उठ खड़ा हुआ, हँसता हुआ हमारे सम्मुख आया- अच्छा सखियों! तुम्हारी ही बात रहे।
उसने कहा- चलो।
इस सुन्दर रात्रिका नाच, गा और खेलकर सदुपयोगकर लिया जाये।'
'अपने पीताम्बरसे उसने हम सबके मुख पोंछे।
जैसे हमारे मृत - तनमें जीवन जाग उठा हो, उस प्रसन्नताका वर्णन कैसे करूँ!
कानोंके पथसे, जैसे जलते हुए हृदयपर सुधा धारा उडेली गयी हो।
गजराजके साथ करिनियोंके झुंड - सी हम यमुनातटपर आयी और श्यामसुन्दरने 'मैं तुम्हारा क्या प्रिय करूँ सखियों ?'
कहकर किसीके पुष्पवलय, किसीकी वेणी, किसीके नुपुर, हार, भुजबंद, करधनी और सीमन्तादि आभूषण बनाकर वह पहनाने लगे।
साथ - ही - साथ हास - परिहास भी चला ।
हमारे आनन्द कलरवसे वह पुलिन मुखरित हो उठा; तुम्हें वह सब स्मरण है न बहिन!'
'ललिता! यह सब तो हमारे एकान्त हृदयका अमूल्यवित्त है।
इसका विस्मरण ही हमारा अन्त है बहिन! अहा, उस समय हृदय आवेगसे कैसा अवश हो गया था कि छोटे - से - छोटा कार्य करनेमें भी हम असमर्थ हो गयी थीं।
सिरसे ओढ़नी भी सरकती, तो ओढ़ानेके लिये उन्हें पुकारती और वे शीलधाम सबके मनोरथ पूर्ण करते हमारे बीच घूमते फिर रहे थे।
हाय! एकबार भी हमें स्मरण नहीं हुआ कि वे सुमन —
सुकुमार श्रान्त हो रहे हैं!
हम अपने मान - सम्मानमें डूबी सौभाग्यपर इठला रही थीं कि अकस्मात वे न जाने कहाँ खो गये.... ।'
– विशाखा अचेत हो भूमिपर लुढ़क गयी।
प्रीत किये दुख होत—
यह वाक्य यदि केवल सांसारिक प्रेम पर लगाया जाए तो प्रेम दुःख का कारण दिखाई देता है;
लेकिन भागवत की दृष्टि से यही विरह प्रेम को और अधिक गहरा करता है।
श्रीकृष्ण की स्मृति ही उनका जीवन बन गई ;
श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के तीसवें अध्याय में वर्णन आता है कि श्रीकृष्ण के अन्तर्धान होने पर व्रजांगनाएँ उन्हें खोजने लगीं।
वे वृक्षों, लताओं और वन के अन्य उपादानों से श्रीकृष्ण के विषय में पूछती हुई आगे बढ़ती हैं।
उनके लिए वन का प्रत्येक दृश्य कृष्ण की स्मृति जगाता है।
फिर दशम स्कंध के इकतीसवें अध्याय में गोपियों का गोपीगीत प्रकट होता है।
यह गीत किसी मनोरंजन का गीत नहीं है।
यह विरह में डूबे हुए हृदय की पुकार है।
'आह! यह पाषाण हृदया ललिता ही रह शेष रह गयी है सब सहने को।
बहिन विशाखा! कैसे समझाऊँ तुम्हें—
वे दिन दूरि गये।
उस दिन कुछ क्षणोंमें ही उन्हें न देख पानेसे हम अर्ध- विक्षिप्त हो गयी थी, आज अनिश्चितकालके लिये उन्हें खोकर भी हम जी रही हैं।
धिक्कार है प्राणोंकी इस परुषता को !'
वे श्रीकृष्ण को पुकारती हैं—
“जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः...”
हे प्रिय! आपके जन्म से व्रज की महिमा बढ़ गई है।
आपके दर्शन के लिए हम दिशाओं में आपको खोज रही हैं।
इस प्रकार गोपियों की दृष्टि में श्रीकृष्ण की अनुपस्थिति भी श्रीकृष्ण की उपस्थिति का ही माध्यम बन जाती है। वे जहाँ देखती हैं, वहीं कृष्ण को खोजती हैं।
उद्धव के सामने खुला प्रेम का रहस्य ;
जब उद्धव गोपियों के सामने श्रीकृष्ण का संदेश लेकर आते हैं, तब वे उन्हें समझाते हैं।
उद्धव कहते हैं—
“अहो यूयं स्म पूर्णार्था भवत्यो लोकपूजिताः ।
वासुदेवे भगवति यासामित्यर्पितं मनः ॥”
— श्रीमद्भागवत 10.47.23
अर्थात् जिनका मन भगवान् वासुदेव में समर्पित हो चुका है, वे वास्तव में जीवन के परम प्रयोजन को प्राप्त कर चुकी हैं।
यहाँ भागवत एक बहुत बड़ा सिद्धान्त सामने रखता है।
मनुष्य अनेक साधन करता है—
दान, व्रत, तप, होम, जप, स्वाध्याय और संयम।
अगले श्लोक में उद्धव इन्हीं साधनों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण में भक्ति की प्राप्ति इन्हीं विविध साधनों से होती है।
लेकिन गोपियों के भीतर जो भक्ति है, वह अत्यंत दुर्लभ बताई गई है।
“भगवत्युत्तमःश्लोके भवतीभिरनुत्तमा ।
भक्तिः प्रवर्तिता दिष्ट्या मुनीनामपि दुर्लभा ॥”
— श्रीमद्भागवत 10.47.25
उद्धव स्वीकार करते हैं कि गोपियों में भगवान् के प्रति जो अनुत्तम भक्ति प्रकट हुई है, वह मुनियों के लिए भी दुर्लभ है।
विरह ने प्रेम को समाप्त नहीं किया ;
सामान्य जीवन में जब कोई प्रिय व्यक्ति दूर हो जाता है, तो समय के साथ उसकी स्मृति कम हो सकती है।
'बहिन! चैतन्य लाभ करो ।
तनिक देखो तो!
तुम उस छोटी-सी हानिको लेकर ही क्षुब्ध - मथित हो रही हो, जब वर्तमानमें आओगी तो धैर्यका कहीं कूल किनारा ही न पा सकोगी।
बहिन विशाखा! सुनो मेरी बात न सुनोगी ?
महारासका वह आनन्द महासिन्धु; उसमें अवगाहन न करोगी ?
आँखें खोलो तो बहिन।'
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लेकिन गोपियों के प्रेम में उलटा होता है।
वियोग बढ़ता है तो स्मरण और बढ़ता है।
श्रीमद्भागवत में यही कारण है कि गोपियाँ श्रीकृष्ण के बाल्य और किशोरकाल की लीलाओं को बार-बार स्मरण करती हैं।
वे कभी रोती हैं, कभी श्रीकृष्ण के कार्यों का स्मरण करती हैं और कभी उनकी चर्चा करती हैं।
यही वह स्थिति है जहाँ “प्रीत किये दुख होत” का रहस्य बदल जाता है।
दुःख प्रेम को नष्ट नहीं करता।
विरह प्रेम को भीतर और गहरा कर देता है।
भ्रमरगीत — जब भौंरा बना संदेशवाहक ;
दशम स्कंध 47 में एक अत्यंत प्रसिद्ध प्रसंग आता है।
एक गोपी श्रीकृष्ण के विरह में अत्यंत व्याकुल है।
तभी उसके सामने एक भ्रमर आता है।
वह उस भ्रमर को श्रीकृष्ण का संदेशवाहक मानकर उससे बात करने लगती है।
यहीं से भ्रमरगीत प्रारम्भ होता है।
वह भ्रमर से श्रीकृष्ण की शिकायत करती है।
उसके शब्दों में कभी रोष है, कभी व्यंग्य है, कभी स्मरण है और कभी गहरी प्रेम - वेदना।
वह कहती है कि जिस प्रकार भ्रमर एक फूल से दूसरे फूल की ओर चला जाता है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण भी व्रज की स्त्रियों को छोड़कर दूसरी स्त्रियों के प्रति अनुरक्त हो गए हैं।
लेकिन इस शिकायत के भीतर भी कृष्ण ही हैं।
वह कृष्ण से विमुख होकर कृष्ण की चर्चा नहीं कर रही।
वह कृष्ण की चर्चा करते हुए कृष्ण में ही डूबी हुई है।
यही प्रेम की अद्भुत अवस्था है।
शिकायत में भी कृष्ण, स्मरण में भी कृष्ण ;
गोपियों की वाणी को केवल बाहरी शब्दों से पढ़ने पर ऐसा लग सकता है कि वे श्रीकृष्ण से नाराज हैं।
लेकिन भागवत के आगे के वर्णन से स्पष्ट होता है कि उनकी चेतना पूर्णतः कृष्णमयी है।
उद्धव स्वयं इस अवस्था को देखकर आश्चर्यचकित होते हैं।
वे कहते हैं कि गोपियों ने भगवान् में ऐसी सर्वोच्च भक्ति स्थापित की है जो महान् मुनियों के लिए भी दुर्लभ है।
वे यहाँ तक कहते हैं कि गोपियों का विरह भगवान् में उनकी पूर्ण आत्म - निष्ठा का कारण बन गया है।
इस लिए गोपी-विरह को केवल दुःख कहना अधूरा है।
यह विरह में भी अखण्ड भगवत्स्मरण है।
श्रीकृष्ण क्यों दूर हुए?
श्रीमद्भागवत की कथा में श्रीकृष्ण का व्रज से मथुरा जाना केवल व्यक्तिगत संबंधों का प्रसंग नहीं है।
कंस-वध, धर्म की स्थापना और आगे की भगवान् की लीलाएँ भी उसी क्रम में आती हैं।
लेकिन व्रज की दृष्टि से यह दूरी अत्यंत पीड़ादायक है।
श्रीकृष्ण मथुरा में हैं और व्रज में उनकी स्मृति है।
गोपियों के लिए कृष्ण का शरीर सामने नहीं है, लेकिन उनका मन कृष्ण से अलग नहीं हुआ।
यही बात भक्ति के गूढ़ सिद्धान्त को प्रकट करती है—
भगवान् का बाहरी दर्शन समाप्त हो सकता है, परन्तु सच्चा भगवत्स्मरण समाप्त नहीं होता।
“सखियों के श्याम” का वास्तविक स्वरूप ;
सखियों के श्याम वह हैं जिन्हें उन्होंने केवल आँखों से नहीं देखा, बल्कि अपने अंतःकरण में धारण किया।
उनकी स्मृति में श्रीकृष्ण हैं।
उनकी वाणी में श्रीकृष्ण हैं।
उनके गीत में श्रीकृष्ण हैं।
उनके विरह में श्रीकृष्ण हैं।
उनकी शिकायत में भी श्रीकृष्ण हैं।
और उनकी आशा में भी श्रीकृष्ण हैं।
इसीलिए भागवत की दृष्टि से उनका प्रेम सामान्य आकर्षण नहीं है।
उद्धव का अंतिम अनुभव भी इसी सत्य की पुष्टि करता है।
' आह श्यामसुन्दर !
भली करी तुमने।' —
कहकर विशाखाने उठनेका प्रयत्न किया तो ललिताने बाँहें बढ़ाकर सहायता दी।
'आगे कह बहिन।'
'क्या करोगी सुनकर ? "
'सो नहीं जानती ललिता! किंतु इस चर्चाके अतिरिक्त हमारे लिये अन्य उपाय ही क्या है ?"
श्रीकिशोरी जू के समीप कौन है ?'
'सुदेवी और चन्द्रावली बहिन हैं।
वे अचेत हैं, उनकी अवस्था देखी नहीं जाती।
श्यामसुन्दर !
जिन आँखोंकी तनिक-सी उदासी तुम सह नहीं पाते थे, आज वे ही नेत्र तुम्हारे ही कारण निर्झर बन गये हैं।
तुम तो इतने कठोर कभी नहीं थे।
यदि कोई अपराध बन पड़ा हो तो हमें अनन्त काल तक दर्शन न दो।
हम विरहाग्निमें जलती रहकर भी सुखी रहेंगी, किंतु तुम राधा बहिनको कष्ट न दो, हमसे सहा नहीं जाता।
नया स्थान देखनेके लोभने तुम्हें इतना निष्ठुर बना दिया कि उन्हें, जो तुम्हारे ही अवलम्बपर जी रही हैं, नितान्त भुला बैठे ?
‘उस दिन, हाँ उस दिन जो किशोरीजी हम सखियोंके सामने भी तुमसे कुछ कहते सकुचा जाती थीं, वह संकोच और शीलकी प्रतिमूर्ति श्रीराधा गुरुजनोंके सम्मुख ही कातर हो ऊँचे स्वरसे 'गोविन्द !
दामोदर! माधव!'
कहकर पुकार उठी थीं।
वस्त्रों का ध्यान भूल अजस्त्र अश्रुवर्षण करते नेत्र तुम्हारे मुखपर टिकाये लज्जा त्यागकर उन्होंने तुम्हारे पीतपटका छोर थाम लिया था।
यह देख बड़े-बूढ़ोंके नेत्र भी बरस पड़े थे और महाबली रामने व्यथासे मुख फेर लिया।
क्या तुम तनिक भी न समझ सके कि किशोरीजीसे यह नितान्त असम्भव कार्य किस प्रकार सम्भव हो सका ?"
'आह निर्मम !
कोमलता पूर्वक धीरेसे अपना वस्त्र छुड़ाते हुए तुमने एक वाक्य- केवल एक छोटा सा वाक्य कहा था 'अहम् आयास्मे।'
और तुम रथपर जा चढ़े थे।
जब रथ चल पड़ा तो मैंने दौड़कर घोड़ोंकी वल्गा थाम ली थी, कई बहिनें घोड़ोंके आगे पथमें सो गयी थी।
मैंने वल्गा थामे ही कातर याचनाकी थी—
श्याम जू! वे स्वर्णवल्लरी छिन्न यूथिका सी भूमिपर पड़ी हैं, उन श्रीराधाको मैं कैसे धैर्य बंधाऊँगी?
तब तुमने अपने आँसू भरे विवश नेत्रोंसे मेरी ओर देखकर कंठसे गुंजामाल उतारकर दी थी।
वहीं गुंजामाल, जब उनके तड़फते हुए प्राण देहपिंजरसे मुक्त होना चाहते हैं, तो हम उनके गलेमें पहना देती है और तुम्हारे 'अहम् आयास्मे ।'
का मधुर मंत्र उनके कानोंमें सुनाती हैं, जिससे उनका प्राणपंछी कुछ समयके लिये पुनः अर्गलाबद्ध हो शाँति पा जाता है।'
‘तुम्हारे उन भरे-भरे नेत्रोंको देखकर समझा था—
राजा कंसकी आज्ञासे विवश होकर जा रहे हैं।
जैसे ही अवकाश मिला, तुरन्त लौट आयेंगे।
मथुरा है ही कितनी दूर ?
श्यामसुन्दर! सब लौट आये, पर तुम न आये।
कंस मर गया है किंतु तुम्हें अवकाश न मिला।
निर्दयी! आज तुम्हारे उसी एक वाक्यपर भानुललीके प्राण अटके हैं।
ओ निष्ठुर! जिनके एक दिन दर्शन न पाकर तुम व्याकुल हो उठते थे; आकर देख लो विरहमें उनकी कैसी अवस्था हो गयी है।
गुरुजनोंसे भी वे अपने दुःखकी लज्जास्पद स्थिति छिपा नहीं पातीं।
श्यामसुंदर, मैं तुम्हारे पाय परूँ !
एक बार चलकर उन्हें देख लो, उनके नेत्रोंकी प्यास बुझा दो।'
'हाय, कितने दिन हम उन्हें भुलावे में रख सकेंगी, चलो.... चलो मोहन !
उनकी जीवन हानिसे बढ़कर व्रजकी तुम्हारी और क्या हानि होगी ? .....
चलो माधव!'
'ललिता ! उठ बहिन, किशोरीजीके समीप चलें।
जो प्रेमके अतिरिक्त अन्य किसी भी प्रकार वशमें नहीं होता; वह आयेगा भी तो श्रीकिशोरीजीके ही कारण !
उस प्रेमसिन्धुके मिस हम भी दर्शन पा लेंगी; इस अरण्य रोदनसे क्या होगा!'
श्रीमद्भागवत 10.47.57 में कहा गया है कि गोपियों की चेतना कृष्ण में इतनी निमग्न हो चुकी थी कि उन्हें देखकर उद्धव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें प्रणाम किया।
इसके बाद 10.47.58 में उद्धव गोपियों की महिमा का वर्णन करते हैं और उनके प्रेम को अत्यंत उच्च स्थिति बताते हैं।
आगे वे कहते हैं कि व्रज की गोपियों को जो कृपा प्राप्त हुई, वह अत्यंत दुर्लभ है।
प्रेम का अंतिम फल ;
यहाँ एक बहुत गहरा प्रश्न सामने आता है—
यदि प्रेम में इतना विरह है, इतना दुःख है, तो गोपियाँ इस प्रेम को छोड़ क्यों नहीं देतीं?
उत्तर भागवत स्वयं देता है।
क्योंकि यह प्रेम किसी सांसारिक लाभ के लिए नहीं है।
यह प्रेम भगवान् को पाने के लिए है, भगवान् से कुछ पाने के लिए नहीं।
जब प्रेम में स्वार्थ नहीं रहता, तब प्रियतम की प्रसन्नता ही प्रेम का लक्ष्य बन जाती है।
इसीलिए गोपियों का प्रेम अपने सुख की अपेक्षा श्रीकृष्ण के सुख से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।
यहाँ प्रेम की पराकाष्ठा है।
विरह भी साधना बन सकता है ;
मनुष्य के जीवन में कभी-कभी ऐसा समय आता है जब उसे लगता है कि भगवान् उसकी प्रार्थना नहीं सुन रहे।
उसे भगवान् का साक्षात्कार नहीं हो रहा।
उसकी इच्छा पूरी नहीं हो रही।
वह भीतर से अकेला अनुभव करता है।
ऐसे समय श्रीमद्भागवत की गोपी-लीला एक अत्यंत गहरा आध्यात्मिक संदेश देती है—
भगवान् का अनुभव केवल प्रत्यक्ष दर्शन में नहीं है।
यदि भगवान् की अनुपस्थिति में भी भगवान् का स्मरण बना रहे, तो वही स्मरण साधना बन सकता है।
गोपियों का विरह इसी सत्य का चरम उदाहरण है।
वे कृष्ण को खोजती हैं, कृष्ण को पुकारती हैं, कृष्ण की चर्चा करती हैं और कृष्ण की लीलाओं का स्मरण करती हैं।
इस प्रकार वियोग भी उनके लिए भगवत्स्मरण का माध्यम बन जाता है।
+++ +++
उद्धव भी बदल गए ;
उद्धव प्रारम्भ में श्रीकृष्ण के संदेशवाहक बनकर व्रज आते हैं।
लेकिन व्रज में गोपियों की भक्ति देखकर उनका अपना दृष्टिकोण और अधिक गहरा होता है।
वे गोपियों की भक्ति के सामने स्वयं को छोटा अनुभव करते हैं।
भागवत में उद्धव का यह भाव अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वे ऐसी भक्ति की प्रशंसा करते हैं जो बड़े-बड़े तपस्वियों के लिए भी दुर्लभ है।
अन्ततः उद्धव कृष्ण के पास लौटकर व्रजवासियों की प्रेम-भक्ति की महिमा बताते हैं।
इस लिए व्रज की गोपियाँ केवल कथा की पात्र नहीं रह जातीं।
वे भक्ति के आदर्श के रूप में सामने आती हैं।
“प्रीत किये दुख होत” — लेकिन यह दुख कैसा?
सांसारिक प्रेम में व्यक्ति कह सकता है—
“मैंने प्रेम किया, इसलिए मुझे दुःख मिला।”
लेकिन भगवत्प्रेम में बात बदल जाती है—
“मैंने भगवान् से प्रेम किया, इसलिए उनका स्मरण कभी छूटा नहीं।”
विरह में आँखें रोती हैं, लेकिन मन भगवान् को नहीं छोड़ता।
यही गोपियों की स्थिति है।
इस लिए उनके प्रेम का दुःख भी साधारण दुःख नहीं है।
वह कृष्ण - विरह की अग्नि है।
उस अग्नि में अहंकार जलता है।
स्वार्थ जलता है।
अपना सुख पाने की इच्छा जलती है।
और अंत में जो बचता है, वह है—
केवल श्रीकृष्ण का स्मरण।
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निष्कर्ष ;
“सखियों के श्याम” की कथा का सार यही है कि श्रीकृष्ण व्रज से दूर हुए, लेकिन गोपियों के हृदय से कभी दूर नहीं हुए।
शरीर से दूरी हुई, स्मरण से नहीं।
दर्शन से दूरी हुई, प्रेम से नहीं।
सामने से दूरी हुई, चेतना से नहीं।
श्रीमद्भागवत का दशम स्कंध इसी प्रेम को बार-बार सामने लाता है।
गोपियों ने कृष्ण को केवल देखा नहीं था—
उन्होंने कृष्ण को अपने मन में धारण किया था।
इसी लिए कृष्ण के चले जाने के बाद भी कृष्ण उनके पास ही रहे।
भ्रमर आया तो कृष्ण की याद आई।
वन दिखाई दिया तो कृष्ण की याद आई।
वृक्ष दिखाई दिए तो कृष्ण की याद आई।
गीत उठा तो कृष्ण की याद आई।
विरह आया तो कृष्ण की याद आई।
और जब उद्धव आए तो उनकी आँखों के सामने भी कृष्ण ही थे।
यही है—
सखियों के श्याम।
यही है—
श्रीमद्भागवत का गोपी-प्रेम।
और यही “प्रीत किये दुख होत” का शास्त्रोक्त गूढ़ अर्थ है—
जिस प्रेम में अपना सुख प्रधान हो, वहाँ वियोग दुःख देता है;
लेकिन जिस प्रेम में प्रियतम ही जीवन का सर्वस्व हो जाए, वहाँ विरह भी उसी प्रियतम का अखण्ड स्मरण बन जाता है।
श्रीमद्भागवत इसी प्रेम को साधारण आसक्ति से अलग करके भगवान् के प्रति परम भक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है।
उद्धव स्वयं स्वीकार करते हैं कि गोपियों में प्रकट ऐसी भक्ति मुनियों के लिए भी दुर्लभ है।
जय श्री राधे कृष्ण 🙏जय श्री राधे...... श्री राधे....... श्री राधे 🙏🏽 जय श्री श्यामसुंदर 🙏
!!!!! शुभमस्तु !!!
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पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 ( तमिलनाडु )
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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....



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