https://www.profitablecpmrate.com/gtfhp9z6u?key=af9a967ab51882fa8e8eec44994969ec 3. आध्यात्मिकता का नशा की संगत भाग 2: 💐💐शिकंजी का स्वाद 💐💐

💐💐शिकंजी का स्वाद 💐💐

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

*💐💐शिकंजी का स्वाद*💐💐

एक प्रोफ़ेसर क्लास ले रहे थे,क्लास के सभी छात्र बड़ी ही रूचि से उनके लेक्चर को सुन रहे थे.।

उनके पूछे गये सवालों के जवाब दे रहे थे. लेकिन उन छात्रों के बीच कक्षा में एक छात्र ऐसा भी था, जो चुपचाप और गुमसुम बैठा हुआ था.।

प्रोफ़ेसर ने पहले ही दिन उस छात्र को नोटिस कर लिया, लेकिन कुछ नहीं बोले. लेकिन जब ४-५ दिन तक ऐसा ही चला, तो उन्होंने उस छात्र को क्लास के बाद अपने केबिन में बुलवाया और पूछा, “तुम हर समय उदास रहते हो।





ArtX God Bal Krishna Makkhan Gopal Photo Frame, Multicolor, 9.25X12.75 in, Set of 1

Visit the ArtX Store  https://amzn.to/4oLi1R6



क्लास में अकेले और चुपचाप बैठे रहते हो,लेक्चर पर भी ध्यान नहीं देते, क्या बात है? 

कुछ परेशानी है क्या?”

सर, वो…..!” 

छात्र कुछ हिचकिचाते हुए बोला, “…. मेरे अतीत में कुछ ऐसा हुआ है, जिसकी वजह से मैं परेशान रहता हूँ।

समझ नहीं आता क्या करूं?”

प्रोफ़ेसर भले व्यक्ति थे. उन्होंने उस छात्र को शाम को अपने घर पर बुलवाया।

शाम को जब छात्र प्रोफ़ेसर के घर पहुँचा, तो प्रोफ़ेसर ने उसे अंदर बुलाकर बैठाया।

फिर स्वयं किचन में चले गये और शिकंजी बनाने लगे. उन्होंने जानबूझकर शिकंजी में ज्यादा नमक डाल दिया।

फिर किचन से बाहर आकर शिकंजी का गिलास छात्र को देकर कहा, “ये लो, शिकंजी पियो।”

छात्र ने गिलास हाथ में लेकर जैसे ही एक घूंट लिया, अधिक नमक के स्वाद के कारण उसका मुँह अजीब सा बन गया।

यह देख प्रोफ़ेसर ने पूछा, “क्या हुआ? शिकंजी पसंद नहीं आई?”

“नहीं सर, ऐसी बात नहीं है. बस शिकंजी में नमक थोड़ा ज्यादा है.” छात्र बोला।

“अरे, अब तो ये बेकार हो गया,लाओ गिलास मुझे दो,मैं इसे फेंक देता हूँ।"

 प्रोफ़ेसर ने छात्र से गिलास लेने के लिए अपना हाथ बढ़ाया. लेकिन छात्र ने मना करते हुए कहा, “नहीं सर, बस नमक ही तो ज्यादा है. थोड़ी चीनी और मिलायेंगे, तो स्वाद ठीक हो जायेगा.”

यह बात सुन प्रोफ़ेसर गंभीर हो गए और बोले, “सही कहा तुमने. 

अब इसे समझ भी जाओ. ये शिकंजी तुम्हारी जिंदगी है. इसमें घुला अधिक नमक तुम्हारे अतीत के बुरे अनुभव है. जैसे नमक को शिकंजी से बाहर नहीं निकाल सकते, वैसे ही उन बुरे अनुभवों को भी जीवन से अलग नहीं कर सकते....!




वे बुरे अनुभव भी जीवन का हिस्सा ही हैं. 

लेकिन जिस तरह हम चीनी घोलकर शिकंजी का स्वाद बदल सकते हैं.

वैसे ही बुरे अनुभवों को भूलने के लिए जीवन में मिठास तो घोलनी पड़ेगी ना. 

इस लिए मैं चाहता हूँ कि तुम अब अपने जीवन में मिठास घोलो.”

प्रोफ़ेसर की बात छात्र समझ गया और उसने निश्चय किया कि अब वह बीती बातों से परेशान नहीं होगा.

सीख – जीवन में अक्सर हम अतीत की बुरी यादों और अनुभवों को याद कर दु:खी होते रहते हैं. इस तरह हम अपने वर्तमान पर ध्यान नहीं दे पाते और कहीं न कहीं अपना भविष्य बिगाड़ लेते हैं. जो हो चुका, उसे सुधारा नहीं जा सकता।

लेकिन कम से कम उसे भुलाया तो जा सकता है और उन्हें भुलाने के लिए नई मीठी यादें हमें आज बनानी होगी।

जीवन में मीठे और ख़ुशनुमा लम्हों को लाइये, तभी तो जीवन में मिठास आयेगी।

*सदैव प्रसन्न रहिये!!*

*जय श्री कृष्ण...! जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!*






Yashika Women's Elegant Chiffon Saree Set with Blouse Piece - Elevate Your Style with This Trendy Ensemble!

Visit the Yashika Store  https://amzn.to/4iPuMbN




|| श्रीमद् भागवत रहस्य-||


यशोदाजी कन्हैया को डाँटने लगी। घर में तुझे खाने को नहीं मिलता है क्या ? 

महाराज की खीर क्यों खाई?

कन्हैया बोले-तू मुझे डाँट रही है,किन्तु मै क्या करू? 

महाराज ने ही तो मुझे खीर खाने बुलाया था। 

गर्गाचार्य बोले- मैंने तो वैकुंठवासी नारायण को बुलाया था। 

कन्हैया कहता है-मै ही तो हूँ वह वैकुंठवासी नारायण।

यशोदाजी कहती है-ऐसा नहीं बोलते। 

तू कहाँ का नारायण हो गया? 

वैंकुंठ के नारायण के तो चार हाथ है, तेरे कहाँ चार हाथ है?

कन्हैया कहता है-माँ यदि तू कहे तो मै चतुर्भुज हो जाऊँ।

यशोदाजी ने सोचा कि यदि इसने चतुर्भुज का रूप धारण कर दिया तो लोग मानेंगे कि यह लड़का यशोदा का नहीं है। 

+++ +++

कोई जादूगर है। 

सो उन्होंने कहा -नहीं,नहीं। 

चार हाथो वाले नारायण की अपेक्षा मेरा दो हाथों वाला मुरलीधर अच्छा है। 

तू जो है वही रहना।

फिर यशोदाजी ने गर्गाचार्य से कहा -यह लड़का नादान है इसकी बातों में न आना। 

कृपा करके आप फिर से खीर बना लीजिए। 

महाराज फिर स्नान करने यमुना की ओर चल दिए। 

लाला यशोदा की गोद में बैठकर कहने लगा, माँ,मै कोयल जैसा बोल सकता हूँ। 

और कुहू कुहू करने लगा। 

उसका कंठ इतना मीठा है कि मोर भी आकर नाचने लगा। 

कन्हैया माँ से कहने लगा,माँ, मै भी मोर की तरह नाच सकता हूँ और वह ठुमक-ठुमक नाचने लगा।

यशोदा-बेटा तूने यह नाचना किससे सीखा है?

कन्हैया माँ,मै तो तेरे पेट में से सीख कर आया हूँ।

यह कन्हैया का गुरु कोई नहीं हो सकता। 

वह सबका गुरु है। 

कृष्ण वन्दे जगदगुरुम!

महाराज ने फिरसे खीर बनाकर ठंडी की है। 

इस तरफ लाला ने मज़ाक किया। 

जाकर माँ की गोद में सो गया। 

यशोदाजी सोचती है कि अब लाला सो गया है तो महाराज आराम से भोजन कर सकेंगे। 

गर्गाचार्य ने खीर पर तुलसीदल बिखेरा और प्रार्थना करने लगे - नाथ, आपका सेवक हूँ।

हे नारायण,लक्ष्मीपति आप शीघ्र पधारिये और मेरी खीर का प्राशन कीजिये।

कन्हैया ने यह सुना तो जाने के लिए अधीर हो गया, उसने योगमाया को यशोदा की आँखोंमें जा बसने की आज्ञा दी। 

यशोदा की आँखे नींद से भरी नहीं कि -कन्हैया दौड़ता हुआ गंगाचार्य के पास आया और खीर खाने लगा। 

गर्गाचार्य ने देखा। 

अरे! यह वैश्य बालक ने तो फिर से मेरी खीर झूठी कर दी। 

कन्हैया ने सोचा कि -बेचारे इस ब्राह्मण को मै कब तक भरमाता रहू। 

उसने अपना चतुर्भुज स्वरुप प्रकट किया। 

महाराज,आप जिस नारायण की आराधना कर रहे हो,वह मै ही हूँ और गोकुल में कन्हैया का रूप लेकर अवतरित हुआ हूँ।

आपकी तपश्चर्या सफल हुई।

गर्गाचार्य ने सानन्द दर्शन किया और अति-प्रेम से स्तब्ध से हो गए। 

आंखोमे आंसू भर आये है।

वे सोचने लगे, कितना अच्छा हो यदि प्रभु मेरी गोद में आ बैठे। 

कन्हैया गर्गाचार्य की गोद में बैठ गया और कहने लगा,महाराज अब आप भोजन कीजिए। 

गर्गाचार्य- जब मेरे इष्टदेव ही मेरे मुँह में कौर रखेंगे,तभी मै खाऊँगा।

            || जय श्री कृष्ण जी ||

+++ +++

|| श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं ||


गोपियो ! 

तुमने मेरे लिये गृह की उन कठिन बेड़ियों को तोड़ डाला है, जिन्हें तोड़ना बहुत ही कठिन है | 

तुम्हारा यह आत्ममिलन निर्मल-निर्दोष है | 

मैं देवताओं की आयु में भी तुम्हारा ऋण नहीं चुका सकता | 

तुम अपने सौम्य स्वभाव से ही मुझे ऋण मुक्त कर सकती हो |

     (श्रीमदभा. 10/32/22)

जीव कितनी भी उत्कृष्ट सुदुर्लभ वस्तु, स्थिति, मति या गति चाहे या प्राप्त करे, श्रीकृष्ण प्रेमधन के साथ किसी की भी, किसी अंश में भी तुलना नहीं हो सकती!

(श्रीराधा-माधाव-चिन्तन)
  पेज 643 पुस्तक कोड 49 गीताप्रेस)

कृष्ण की संगति में मन अपने
  दर्द का अर्थ समझने लगता है।

दर्द हर किसी के जीवन में आता है,लेकिन उसका अर्थ हर कोई नहीं समझ पाता।

कृष्ण से जुड़ने वाला व्यक्ति अपने दर्द को केवल भावनात्मक बोझ नहीं मानता वह उसे जीवन का संदेश समझता है। 

कृष्ण मन को यह सिखाते हैं कि दर्द कोई दंड नहीं, बल्कि परिवर्तन का संकेत है।

यह संकेत है कि भीतर कुछ नया जन्म लेने वाला है, कुछ नया समझ में आने वाला है।

कान्हा की संगति में मन उस दर्द को स्वीकारना सीखता है, उससे डरना नहीं।

धीरे - धीरे वह समझने लगता है कि जो भी हुआ, वह किसी दिव्य योजना का हिस्सा था।

कृष्ण का प्रेम दर्द को कम नहीं करता,वह व्यक्ति को इतना मजबूत बनाता है कि वह दर्द को प्रेम से देख सके।

दुख में भी व्यक्ति को उम्मीद दिखाई देने लगती है।

जो कभी घाव लगता था, वही आगे चलकर चमक बन जाता है।

कृष्ण कहते हैं—

हर दर्द में मैंने तुझे अपने पास बुलाया है।

और यह समझ आते ही मन हल्का हो जाता है।

           || जय श्री कृष्ण जी ||

!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Ramanatha Swami Kovil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits, V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . ‪‪+ 91- 7010668409‬‬ / ‪‪+ 91- 7598240825‬‬ ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85 Web: ‪Sarswatijyotish.com‬
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

No comments:

Post a Comment

मासिक दुर्गाष्टमी

मासिक दुर्गाष्टमी : मासिक दुर्गाष्टमी हिंदू धर्म में एक विशेष पर्व है जो हर महीने शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है।  यह पर्व देवी ...