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जय द्वारकाधीश
श्रीमद् देवी भागवत प्रवचन — नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना कैसे करें ?:
श्रीमद् देवी भागवत प्रवचन — नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना कैसे करें ?
नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना कैसे करें? जानें घटस्थापना की संपूर्ण विधि मंत्र सहित ;
नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा की आराधना से पहले घटस्थापना करने का विधान होता है।
शास्त्रों में कलश गणेश का प्रतीक माना गया है और इसमें सभी देवताओं का आह्वान किया जाता है ताकि जो आप अनुष्ठान करने जा रहे हों वह निर्विघ्न पूरा हो सके।
ऐसे में चलिए विस्तार से जानें नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना की विधि मंत्र सहित।
Esplanade Brass Kalash for Pooja – 4.5" Puja Items for Home Temple Mandir, Lota Pot for Pooja, 100% Brass Utensils for Kitchen, Engraved Peetal Lota
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| Material | Brass |
| Colour | Golden |
| Brand | ESPLANADE |
| Product Dimensions | 11.4L x 19W x 23H Centimeters |
| Shape | Pot |
About this item
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- Traditional Design: Features a classic lota shape that reflects Indian heritage and spiritual tradition. The engraved surface enhances its visual appeal and sacred presence.
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- Dimensions: With dimensions 11.5 x 13 cm, this kalash is compact and easy to handle, perfect for pooja thalis and home altar setups.
घटस्थापना का धार्मिक महत्त्व ;
सनातन धर्म में नवरात्रि आदिशक्ति भगवती दुर्गा की उपासना का विशेष पर्व है।
नवरात्रि के प्रथम दिन प्रतिपदा तिथि में घटस्थापना अथवा कलश स्थापना करके देवी - उपासना का आरम्भ किया जाता है।
इस पूजा में कलश को पवित्रता, मंगल, जीवन और दैवी उपस्थिति का प्रतीक मानकर उसका पूजन किया जाता है।
घटस्थापना का अर्थ केवल किसी पात्र में जल भरकर उसे रख देना नहीं है।
यह देवी की आराधना आरम्भ करने, पूजा का संकल्प लेने और निर्धारित अवधि तक श्रद्धापूर्वक साधना करने की धार्मिक प्रक्रिया है।
नवरात्रि में देवी के नौ स्वरूपों की पूजा की परंपरा प्रचलित है।
प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की आराधना की जाती है।
भक्तजन अपनी कुलपरंपरा, क्षेत्रीय रीति और पूजा - पद्धति के अनुसार कलश स्थापना, जौ बोने, दीप प्रज्वलित करने, दुर्गासप्तशती पाठ तथा देवी मंत्रों का जप करते हैं।
शास्त्रीय संदर्भ: मार्कण्डेयपुराण में वर्णित देवीमाहात्म्य, जिसे दुर्गासप्तशती अथवा श्रीचण्डीपाठ भी कहा जाता है, देवी की महिमा, उपासना और असुरों पर देवी की विजय का महत्त्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ है।
घटस्थापना की प्रचलित घरेलू विधि और देवीमाहात्म्य के प्रत्येक प्रसंग को एक ही विधान मानना उचित नहीं है।
दोनों का धार्मिक महत्त्व अपनी - अपनी परंपरा और प्रसंग में समझना चाहिए।
शारदीय नवरात्रि की शुरुआत से हो रही है।
इस दिन घटस्थापना का विशेष महत्व होता है।
शास्त्रों में कलश को भगवान गणेश का प्रतीक माना जाता है और उसमें सभी देवी - देवताओं का आह्वान किया जाता है।
ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि आप जो अनुष्ठान करने जा रहे हैं वो बिना किसी विघ्न के पूर्ण हो सके।
साथ ही, किसी भी बाधा या नकारात्मक ऊर्जा से पूजा व व्रत बाधित न हो।
ऐसे में गणेशजी को कलश में प्रतिष्ठित किया जाता है और माता दुर्गा की आराधना करने से पहले घटस्थापना की जाती है।
इसे सुख - समृद्धि और मंगलकामनाओं का भी प्रतीक माना जाता है।
ऐसे में आइए विस्तार से जानें शारदीय नवरात्रि घटस्थापना की संपूर्ण विधि और मंत्र।
नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना से पहले करें ये काम ;
शारदीय नवरात्रि के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि करें और साफ वस्त्र धारण करें।
इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करना उत्तम माना जाता है।
घर के मंदिर को अच्छी तरह साफ कर लें और चारों तरफ गंगाजल का छिड़काव करें।
फिर, पूजा घर में पूर्व या उत्तर दिशा ओर मुख करके बैठ जाएं।
हाथ में थोड़ा सा जल लें और उसे सभी पूजन सामग्री पर छिड़कें।
इस के बाद, 'ओम अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा, यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।' मंत्र का उच्चारण करें।
खुद को चंदन का तिलक लगाएं और इस दौरान 'चंदनस्य महतपुण्यं पवित्रं पाप नाशनम, आपदं हरति नित्यं लक्ष्मी तिष्ठति सर्वदा।' मंत्र बोलें।
कलश स्थापना किस दिन और किस समय करनी चाहिए ?
घटस्थापना सामान्यतः चैत्र नवरात्रि अथवा शारदीय नवरात्रि की प्रतिपदा तिथि में की जाती है।
धार्मिक पंचांग परंपरा के अनुसार घटस्थापना के लिए प्रतिपदा तिथि का होना विशेष महत्त्व रखता है।
मुहूर्त निर्धारित करते समय तिथि, स्थानीय सूर्योदय और दिन के शुभ समय का विचार किया जाता है।
द्रिक पंचांग की घटस्थापना संबंधी मार्गदर्शिका में प्रतिपदा के दौरान दिन के प्रथम एक - तिहाई भाग को प्राथमिकता देने तथा आवश्यकता पड़ने पर अभिजित मुहूर्त पर विचार करने का उल्लेख मिलता है।
इस लिए पूजा का समय स्थानीय पंचांग के अनुसार निर्धारित करना चाहिए।
शास्त्रीय सावधानी: प्रतिपदा तिथि और मुहूर्त की गणना स्थान तथा वर्ष के अनुसार बदल सकती है।
किसी एक नगर का मुहूर्त पूरे भारत के लिए समान नहीं माना जाना चाहिए।
सामान्यतः घटस्थापना के लिए अमावस्या में पूजा करने अथवा रात्रि में बिना उचित मुहूर्त के स्थापना करने से बचने की सलाह दी जाती है।
स्थानीय पंचांग में दिए गए निर्देशों और अपनी कुलपरंपरा का पालन करना उचित है।
शारदीय नवरात्रि कलश स्थापना विधि मंत्र सहित ;
मंदिर आप जिस भी स्थान पर कलश स्थापना कर रहे हों, वहां मिट्टी में बालू सप्तमृतिका पीठ का निर्माण करें।
फिर, इसे बीच में से थोड़ा गहरा कर लें ताकि कलश उस पर रखा जा सके।
अब कलश लें और उस पर विधिपूर्वक स्वास्तिक बनाएं।
कलश को मिट्टी के बीच में गहरे स्थान पर स्थापित करें और कलश के गले में मोली लपेटें।
कलश स्थापित करते समय इस बात का ध्यान रखें की इसे पूजा घर में उत्तर या उत्तर - पूर्व दिशा में ही रखना चाहिए।
कलश के नीचे रखी हुई मिट्टी को अपने दाएं हाथ से धीरे - धीरे फैलाएं।
इस दौरान यह मंत्र बोलें- 'ओम भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्रीं, पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृग्वंग ह पृथिवीं मा हि ग्वंग सीः।'
कलश के नीचे सप्तधान और जौ फैलाकर रखें।
फिर, 'ओम धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणाय त्यो दानाय त्वा व्यानाय त्वा, दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धां देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रति गृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि।' मंत्र बोलें।
जौ फैलाने के बाद कलश को स्पर्श करें और यह मंत्र बोलें- 'ओम आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दव:, पुनरूर्जा नि वर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशतादयिः।'
कलश पर फूल अर्पित करें और उसमें जल भरें।
इस दौरान वरुण देवता का ध्यान करें।
जल भरते हुए यह मंत्र बोलें- 'ओम वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्काभसर्जनी स्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमा सीद।'
अब अपने हाथ में फूल लें और उसपर चंदन लगाएं।
फिर, यह मंत्र बोलें- 'ओम त्वां गन्धर्वा अखनस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः, त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान यक्ष्मादमुच्यत।'
हाथ में लिया हुआ पुष्प कलश को ही अर्पित करें।
मान्यता है कि कलश में सर्वोषधि डालने से कलश का जल प्रभावशाली होता है।
ऐसा करते समय यह मंत्र बोलें- 'ओम अश्वस्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता, गोभाज इत्किलासथ यत्सनवथ पूरुषम्।'
कलश में सुपारी डालते हुए यह मंत्र बोलें- 'ओम याः फलिनीर्या अफला अपुष्पायाश्च पुष्पिणीः, बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्व ग्वंग हसः।'
अब एक सिक्का डालें और बोलें 'ओम हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्, स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।'
कलश पर एक लाल कपड़ा बांधते हुए यह मंत्र बोलें- 'ओम सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमाऽसदत्स्वः, वासो अग्ने विश्वरूप ग्वंग सं व्ययस्व विभावसो।'
फिर, एक मिट्टी के बर्तन में अक्षत डालें और उसे कलश के ऊपर रखते हुए बोलें 'ओम पूर्णा दर्वि परा पत सुपूर्णा पुनरा पत, वस्नेव विक्रीणावहा इषमूर्ज ग्वंग शतक्रतो।'
अब एक नारियल लें और उस पर कपड़ा बांधते हुए यह मंत्र बोलें- 'ओम याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः, बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्व हसः।'
इस के बाद, नारियल को कलश पर रखें।
घटस्थापना के लिए आवश्यक पूजन सामग्री ;
कलश स्थापना से पहले सभी आवश्यक सामग्री एकत्र कर लेनी चाहिए।
मुख्य सामग्री इस प्रकार है:
1. मिट्टी का चौड़ा पात्र अथवा जौ बोने के लिए उपयुक्त पात्र।
2. स्वच्छ मिट्टी।
3. जौ के बीज।
4. ताँबे, पीतल अथवा परंपरा के अनुसार उपयुक्त कलश।
5. स्वच्छ जल तथा उपलब्ध होने पर गंगाजल।
6. आम के पत्ते अथवा परंपरा में निर्धारित पवित्र पत्ते।
7. साबुत नारियल।
8. लाल अथवा पूजा-परंपरा के अनुसार उपयुक्त वस्त्र।
9. मौली अथवा कलावा।
10. रोली, कुमकुम, चंदन और अक्षत।
11. पुष्प तथा पुष्पमाला।
12. धूप, दीपक, घी अथवा तेल।
13. फल, मिठाई और नैवेद्य।
14. सुपारी तथा दक्षिणा के लिए सिक्का।
15. देवी की प्रतिमा अथवा चित्र, यदि पूजा में स्थापित किया जाता हो।
16. आसन, पूजा की थाली और जलपात्र।
इन सामग्रियों में क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपरा के अनुसार अंतर हो सकता है।
कुछ परंपराओं में सप्तधान्य का प्रयोग होता है, जबकि अनेक घरों में विशेष रूप से जौ बोए जाते हैं।
इसी प्रकार कलश के भीतर सुपारी, अक्षत, सिक्का, दूर्वा अथवा अन्य सामग्री रखने की विधि भी अलग - अलग पूजा - पद्धतियों में भिन्न हो सकती है।
अतः हर क्षेत्र में एक ही सामग्री - सूची को अनिवार्य शास्त्रीय विधान कहना उचित नहीं होगा।
कलश स्थापना पूजा विधि और मंत्र ;
कलश को स्थापित करने के बाद उसमें सभी देवी - देवताओं का आह्वान करें।
इसके साथ ही, यह मंत्र बोलें- 'ओम तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः, अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुश ग्वंग स मा न आयुः प्र मोषीः।
अस्मिन् कलशे वरुणं साङ्गं सपरिवारं सायुधं सशक्तिकमावाहयामि।
ओम भूर्भुवः स्वः भो वरुण, इहागच्छ, इह तिष्ठ, स्थापयामि, पूजयामि, मम पूजां गृहाण।',
'ओम अपां पतये वरुणाय नमः।'
मंत्र बोलने के बाद कलश को भगवान गणेश मानकर पंचापचार पूजा करनी चाहिए।
साथ ही, कलश में पंचदेवता, दशदिक्पाल और चारों वेदों को आकर वहां विराजने के लिए प्रार्थना करें।
माता रानी की आराधना करने के लिए हाथ में फल, सुपारी, पान, एक सिक्का और चंदन लेकर पूजा का संकल्प करें।
पूजा का संकल्प करने के बाद मन में अपने गौत्र का नाम बोलकर उपासना करते हुए बोलें- 'मैं मां दुर्गा की उपासना करुंगा।
आप मेरे परिवार और मुझ पर अपनी कृपा बनाए रखें।'
इस प्रकार उपासना करने के बाद भगवान गणेश का पूजन करें और फिर, सभी देवी - देवताओं की पूजा करें।
पूजा स्थल की शुद्धि और साधक की तैयारी ;
घटस्थापना के दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
पूजा स्थल को साफ करें और वहाँ आवश्यक सामग्री व्यवस्थित रखें।
पूजा करते समय मन को शांत रखें तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूजा का संकल्प लें।
यदि घर में देवी की प्रतिमा या चित्र पहले से स्थापित है, तो उसे स्वच्छ स्थान पर रखकर पूजा की तैयारी करें।
कलश के लिए ऐसी जगह चुनें जहाँ वह नौ दिनों तक सुरक्षित रह सके और जहाँ प्रतिदिन पूजा करना सुविधाजनक हो।
पूजा के आरम्भ में आचमन, पवित्रीकरण और गणेश स्मरण किया जा सकता है।
इस के बाद अपने इष्टदेव तथा कुलदेवी का स्मरण करें।
पवित्रीकरण के लिए प्रचलित मंत्र है:
मंत्र:
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
भावार्थ:
मनुष्य किसी भी अवस्था में हो, भगवान का स्मरण उसे आंतरिक और बाहरी पवित्रता की ओर प्रेरित करता है।
यह मंत्र वैष्णव परंपरा सहित अनेक पूजा - पद्धतियों में प्रचलित है।
इसे घटस्थापना का एकमात्र अनिवार्य मंत्र नहीं समझना चाहिए।
इस के बाद अपने गुरु, इष्टदेव अथवा कुलपरंपरा के अनुसार प्रार्थना करें।
संकल्प कैसे करें ?
संकल्प का अर्थ है पूजा के उद्देश्य और अपने धार्मिक कर्तव्य के प्रति मन में निश्चय करना।
घटस्थापना के समय साधक अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार संकल्प कर सकता है।
सरल संकल्प:
ॐ श्रीगणेशाय नमः।
ॐ श्रीदुर्गायै नमः।
मम सकुटुम्बस्य क्षेम-स्थैर्य-आरोग्य-समृद्ध्यर्थं, धर्मार्थकाममोक्षफलप्राप्त्यर्थं, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं शारदीय नवरात्रपूजनं घटस्थापनं च करिष्ये।
भावार्थ:
मैं अपने परिवार के कल्याण, स्थिरता, आरोग्य, समृद्धि तथा धर्ममय जीवन की भावना से जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए नवरात्रि पूजन और घटस्थापना का संकल्प करता हूँ।
यह एक सरल, परंपरानुकूल संकल्प-वाक्य है।
विस्तृत वैदिक संकल्प में संवत्सर, मास, पक्ष, तिथि, स्थान और अन्य विवरणों का उल्लेख किया जाता है।
उन्हें सही पंचांग और परंपरा के अनुसार ही जोड़ना चाहिए।
जौ बोने की विधि ;
नवरात्रि में जौ बोने की परंपरा अनेक परिवारों में प्रचलित है।
जौ के अंकुरों को जवारे कहा जाता है।
सबसे पहले चौड़े मिट्टी के पात्र में स्वच्छ मिट्टी डालें।
उसके बाद जौ के बीज समान रूप से बिखेरें।
बीजों के ऊपर थोड़ी मिट्टी डालकर हल्का जल छिड़कें।
इसके बाद पात्र को ऐसे स्थान पर रखें जहाँ जौ के अंकुर विकसित हो सकें।
मिट्टी में आवश्यकता के अनुसार पानी डालें, लेकिन इतना पानी न डालें कि बीज सड़ने लगें।
नवरात्रि के दौरान जवारे के बढ़ने और उनके रंग-रूप को अनेक परंपराओं में धार्मिक दृष्टि से देखा जाता है।
फिर भी पौधों की वृद्धि मिट्टी, पानी, प्रकाश और तापमान जैसी प्राकृतिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करती है।
इस लिए केवल अंकुरों के आधार पर भविष्य की किसी घटना की निश्चित घोषणा करना उचित नहीं है।
महत्त्वपूर्ण बात: जौ बोना प्रचलित नवरात्रि पूजा का महत्त्वपूर्ण अंग है, लेकिन प्रत्येक पूजा - पद्धति में इसका स्वरूप समान नहीं होता।
कलश में जल भरने और स्थापित करने की विधि ;
अब कलश को स्वच्छ जल से भरें। परंपरा के अनुसार उसमें थोड़ा गंगाजल मिलाया जा सकता है।
कुछ पूजा-पद्धतियों में कलश के जल में सुपारी, अक्षत, सिक्का, दूर्वा अथवा सुगंधित द्रव्य डालने की परंपरा है।
जो सामग्री आपकी पूजा-पद्धति में निर्धारित हो, उसी के अनुसार उसका प्रयोग करें।
कलश के बाहरी भाग पर रोली या कुमकुम से स्वस्तिक बनाया जा सकता है।
उसके गले पर मौली बाँधी जा सकती है।
इसके बाद कलश के मुख पर आम के पत्ते रखें।
परंपरा के अनुसार पत्तों की संख्या पाँच या सात हो सकती है।
इनके ऊपर लाल वस्त्र में लिपटा साबुत नारियल रखा जाता है।
नारियल रखते समय ध्यान दें कि कलश स्थिर रहे और गिरने की आशंका न हो।
इस के बाद तैयार कलश को जौ वाले पात्र पर अथवा पूजा - पद्धति में निर्धारित स्थान पर स्थापित करें।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि कुछ परंपराओं में कलश जौ वाले पात्र के बीच रखा जाता है, जबकि कुछ विधियों में वेदी, चौकी या अन्य निर्धारित आधार का उपयोग होता है।
अपनी कुलपरंपरा के अनुसार व्यवस्था करना उचित है।
कलश स्थापना के शास्त्रीय मंत्र ;
कलश स्थापना की विधि में पृथ्वी, अन्न, जल और वरुण का स्मरण करने वाले मंत्रों का प्रयोग मिलता है।
द्रिक पंचांग की कलश स्थापना विधि में निम्न मंत्र दिए गए हैं।
(क) पृथ्वी का स्मरण
मंत्र:
ॐ भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री।
पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृंह पृथिवीं मा हिंसीः॥
भावार्थ:
हे पृथ्वी! आप समस्त प्राणियों का आधार हैं।
आप समस्त संसार को धारण करती हैं।
आप स्थिर रहें और समस्त जीवन का आधार बनी रहें।
यह मंत्र पृथ्वी के आधारभूत स्वरूप का स्मरण कराता है।
(ख) धान्य अथवा अन्न का मंत्र
मंत्र:
ॐ धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणाय त्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा।
दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धां देवो वः सविता हिरण्यपाणिः।
प्रतिगृह्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि॥
भावार्थ:
अन्न जीवन और प्राणों के पोषण का आधार है।
यह मंत्र अन्न के महत्त्व, जीवन के पोषण तथा देवत्व के प्रति कृतज्ञता का स्मरण कराता है।
मंत्रों के पाठ में शाखा, संहिता और पाठ - परंपरा के अनुसार स्वर अथवा पाठांतर हो सकते हैं।
वैदिक मंत्रों का शुद्ध स्वर सहित पाठ करना हो, तो प्रमाणित वैदिक पाठ अथवा योग्य आचार्य का मार्गदर्शन लेना चाहिए।
(ग) कलश का मंत्र
मंत्र:
ॐ आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः।
पुनरूर्जा निवर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः॥
भावार्थ:
कलश के माध्यम से पोषण, ऊर्जा, समृद्धि और मंगल की कामना की जाती है।
यह मंत्र कलश से संबंधित वैदिक मंत्र-पाठों में मिलता है।
इस के उच्चारण और पाठांतर के लिए प्रमाणित पाठ का अनुसरण करना उचित है।
(घ) वरुण देव का स्मरण
मंत्र:
ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनीस्थः।
वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमासीद॥
भावार्थ:
इस मंत्र में वरुण देव के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।
कलश में स्थापित जल को पवित्र मानते हुए जलतत्त्व के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है।
इन मंत्रों का प्रयोग करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वे केवल सजावटी शब्द नहीं हैं।
वैदिक मंत्रों का अपना पाठ-संदर्भ है।
इस लिए मंत्रों को उनके प्रमाणित पाठ और परंपरा के अनुसार ही ग्रहण करना चाहिए।
देवी दुर्गा का आवाहन ;
कलश स्थापित करने के बाद देवी का ध्यान और आवाहन किया जाता है।
भक्त अपने इष्टदेव, कुलदेवी तथा माँ दुर्गा का स्मरण करते हुए प्रार्थना कर सकता है।
प्रार्थना:
ॐ श्रीदुर्गायै नमः।
हे जगदम्बे! श्रद्धापूर्वक की जा रही इस पूजा को स्वीकार करें।
हमारे मन में धर्म, सद्बुद्धि, संयम, करुणा और भक्ति का विकास करें।
हमें अपने कर्तव्यों का पालन करने की शक्ति प्रदान करें।
इसके बाद देवी को पुष्प अर्पित करें।
यह सरल प्रार्थना है, न कि किसी प्राचीन ग्रंथ से लिया गया श्लोक।
इसे देवी - उपासना के भावपूर्ण निवेदन के रूप में पढ़ा जा सकता है।
आवाहन का अर्थ पूजा में देवी का श्रद्धापूर्वक आमंत्रण करना है।
कलश को देवी की उपस्थिति का प्रतीक मानकर उसकी पूजा की जाती है।
नवार्ण मंत्र का जप ;
नवरात्रि में माँ दुर्गा की उपासना के लिए नवार्ण मंत्र का विशेष प्रचलन है।
नवार्ण मंत्र:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
यह मंत्र दुर्गासप्तशती की पाठ - परंपरा में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
इस मंत्र के जप में साधक अपनी परंपरा और गुरु से प्राप्त निर्देशों का पालन कर सकता है।
सामान्य भक्त श्रद्धापूर्वक इसका जप कर सकते हैं।
कुछ साधक प्रतिदिन 108 बार जप करते हैं।
यह एक प्रचलित साधना - पद्धति है, लेकिन प्रत्येक गृहस्थ के लिए समान संख्या अनिवार्य है, ऐसा कहना उचित नहीं होगा।
यदि कोई दुर्गासप्तशती का संपूर्ण पाठ करना चाहता है, तो पाठ - विधि, कवच, अर्गला, कीलक और अन्य अंगों का क्रम अपनी स्वीकृत पाठ - परंपरा के अनुसार अपनाना चाहिए।
प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की पूजा ;
नवरात्रि के प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की आराधना की जाती है।
नवदुर्गा की परंपरागत सूची में माँ शैलपुत्री प्रथम स्वरूप हैं।
उन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में वर्णित किया जाता है।
उनका स्वरूप देवी के शांत, दिव्य और शक्ति से युक्त रूप का स्मरण कराता है।
इस दिन भक्त माँ शैलपुत्री को पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित कर सकते हैं।
पूजा के समय श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपवास रखते हैं, मंत्र - जप करते हैं तथा देवी के प्रति प्रार्थना व्यक्त करते हैं।
माँ शैलपुत्री की पूजा का उद्देश्य केवल बाहरी कर्मकांड पूरा करना नहीं, बल्कि मन में श्रद्धा, धैर्य और सदाचार को दृढ़ करना भी है।
पंचोपचार पूजा की विधि ;
कलश स्थापना और देवी के आवाहन के बाद पंचोपचार पूजा की जा सकती है।
पंचोपचार का अर्थ है पाँच प्रकार से पूजा करना।
प्रचलित पंचोपचार विधि में निम्नलिखित उपचार सम्मिलित होते हैं:
1. गंध — चंदन अथवा परंपरा के अनुसार गंध अर्पित करना।
2. पुष्प — देवी को पुष्प अर्पित करना।
3. धूप — धूप दिखाना।
4. दीप — दीपक से आरती अथवा दीपोपचार करना।
5. नैवेद्य — फल, मिठाई अथवा उपयुक्त भोग अर्पित करना।
इस के बाद देवी की प्रार्थना, स्तोत्र - पाठ और आरती की जा सकती है।
कुछ परंपराओं में षोडशोपचार अथवा अन्य विस्तृत पूजा - विधि अपनाई जाती है।
इस लिए पंचोपचार को प्रत्येक संप्रदाय की एकमात्र विधि नहीं माना जाना चाहिए।
अखंड ज्योति और नवरात्रि के नियम ;
नवरात्रि में अखंड ज्योति प्रज्वलित करने की परंपरा अनेक घरों और मंदिरों में प्रचलित है।
अखंड ज्योति का अर्थ है निर्धारित अवधि तक दीपक को निरंतर प्रज्वलित रखने का संकल्प।
यदि घर में अखंड ज्योति स्थापित की जाती है, तो अग्नि-सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें।
दीपक को स्थिर, अग्निरोधक आधार पर रखें और उसे पर्दे, कागज, कपड़े तथा अन्य ज्वलनशील वस्तुओं से दूर रखें।
दीपक ऐसी जगह न रखें जहाँ बच्चे या पालतू पशु उसे गिरा सकें।
सुरक्षित व्यवस्था के बिना किसी दीपक को जलता हुआ छोड़ना उचित नहीं है।
नवरात्रि में स्वच्छता, संयम, नियमित पूजा, सात्त्विक आहार और सदाचार का पालन अनेक धार्मिक परंपराओं में महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
उपवास का स्वरूप व्यक्ति की सामर्थ्य, स्वास्थ्य और पारिवारिक परंपरा के अनुसार निर्धारित किया जा सकता है।
श्रद्धा के नाम पर शरीर को हानि पहुँचाना आवश्यक नहीं है।
घटस्थापना के बाद नौ दिनों तक क्या करें ?
घटस्थापना के बाद प्रतिदिन निर्धारित समय पर देवी की पूजा करें।
प्रतिदिन कलश के सामने दीप प्रज्वलित करें, पुष्प अर्पित करें और अपनी परंपरा के अनुसार मंत्र - जप या स्तोत्र - पाठ करें।
जौ के पात्र में मिट्टी की नमी की जाँच करें और आवश्यकता के अनुसार थोड़ा पानी दें।
कलश को बार - बार स्थानांतरित न करें।
पूजा स्थल को स्वच्छ रखें तथा नैवेद्य और पुष्प अपनी परंपरा के अनुसार बदलते रहें।
यदि दुर्गासप्तशती का पाठ करने का संकल्प लिया है, तो उसे अपनी निर्धारित पाठ - विधि के अनुसार पूरा करने का प्रयास करें।
अष्टमी अथवा नवमी के दिन कन्या पूजन, हवन, ब्राह्मण भोजन या अन्य धार्मिक कर्म करने की परंपरा कई परिवारों में है।
इन कर्मों की विधि तथा दिन का चयन परिवार की पूजा - पद्धति और स्थानीय पंचांग के अनुसार किया जाता है।
नवरात्रि के समापन पर कलश और जौ के विसर्जन की विधि भी परंपरा के अनुसार अलग - अलग हो सकती है।
पूजा में उपयोग की गई सामग्री का सम्मानपूर्वक निस्तारण करना चाहिए।
जलस्रोतों में ऐसी सामग्री न डालें जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुँचे।
घटस्थापना करते समय किन बातों का ध्यान रखें ?
घटस्थापना करते समय निम्न बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए:
पहली बात: प्रतिपदा तिथि और शुभ मुहूर्त का निर्णय स्थानीय पंचांग के अनुसार करें।
दूसरी बात: पूजा सामग्री स्वच्छ रखें और कलश को स्थिर स्थान पर स्थापित करें।
तीसरी बात: वैदिक मंत्रों का पाठ प्रमाणित पाठ के अनुसार करें।
उच्चारण में संदेह हो तो जानकार आचार्य से सहायता लें।
चौथी बात: अपने परिवार की स्थापित परंपरा और पूजा - पद्धति का सम्मान करें।
पाँचवीं बात: किसी विशेष सामग्री के अभाव में भयभीत न हों।
पूजा की विधि और उसके विकल्पों के बारे में अपनी परंपरा के अनुसार मार्गदर्शन लें।
छठी बात: पूजा के नाम पर किसी व्यक्ति को भय दिखाकर धन माँगना अथवा किसी अनुष्ठान को निश्चित भौतिक फल की गारंटी बताना उचित नहीं है।
सातवीं बात: धार्मिक आस्था के साथ-साथ सुरक्षा, स्वच्छता और पर्यावरण का ध्यान रखें।
RR Pure Brass Kalash for Pooja Home Decor - Handcrafted Ashta Lakshmi Pital Lota Pot for Mandir & Diwali - Kalash for Griha Pravesh, Vastu, Diwali, Navratri, Wedding, & Spiritual Decor (75O ml)
| Material | Brass |
| Colour | Gold |
| Brand | Generic |
| Product Dimensions | 12L x 12W x 13H Centimeters |
| Shape | Oval |
{ About this item
- ✨ SACRED ASHTA LAKSHMI ENGRAVINGS: Invite divine blessings, wealth, and prosperity into your home. This premium brass Kalash features intricately detailed, high-relief engravings of the eight forms of Goddess Lakshmi (Ashta Lakshmi), beautifully channeling traditional spiritual artistry and sacred energy into any room.
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घटस्थापना का वास्तविक संदेश ;
घटस्थापना नवरात्रि की उपासना का आरम्भ है।
कलश जीवन, जल, पोषण और मंगल का प्रतीक माना जाता है।
जौ बोने की परंपरा प्रकृति और अन्न के महत्त्व का स्मरण कराती है।
दीपक प्रकाश, साधना और जागरूकता का प्रतीक है।
माँ दुर्गा की उपासना में शक्ति के साथ विवेक, साहस के साथ संयम और श्रद्धा के साथ सदाचार को महत्त्व दिया जाना चाहिए।
नवरात्रि का उद्देश्य केवल बाहरी अनुष्ठान पूरा करना नहीं, बल्कि अपने आचरण को भी बेहतर बनाना है।
यदि पूजा के साथ सत्य, करुणा, अनुशासन, सेवा और कर्तव्यपालन को स्थान दिया जाए, तो धार्मिक साधना जीवन में सार्थक दिशा प्रदान कर सकती है।
घटस्थापना की परंपरा को समझते समय प्रचलित रीति, प्रमाणित मंत्र और मूल ग्रंथों के संदर्भ में अंतर करना आवश्यक है।
हर प्रचलित नियम को बिना संदर्भ के वेद अथवा पुराण का प्रत्यक्ष आदेश बताना उचित नहीं है।
इसी प्रकार पूजा से संबंधित फल को निश्चित और तत्काल प्राप्त होने वाला परिणाम बताने के बजाय उसे धार्मिक विश्वास, आध्यात्मिक साधना और शुभकामना के संदर्भ में समझना चाहिए।
निष्कर्षतः,
नवरात्रि के प्रथम दिन विधिपूर्वक कलश स्थापना करके माँ दुर्गा की आराधना आरम्भ की जाती है।
स्नान, संकल्प, जौ बोना, कलश में जल भरना, कलश स्थापना, देवी आवाहन, मंत्र-जप, पुष्प - धूप - दीप और नैवेद्य अर्पण इसके प्रमुख अंग हैं।
अपनी कुलपरंपरा, स्थानीय पंचांग और प्रमाणित पूजा - विधि के अनुसार इन कर्मों को संपन्न करना उचित है।
श्रद्धा, शुद्ध आचरण और विवेक के साथ की गई देवी - उपासना ही नवरात्रि की साधना को सार्थक बनाती है।
शास्त्रीय एवं संदर्भ स्रोत ;
1. मार्कण्डेयपुराण — देवीमाहात्म्य / दुर्गासप्तशती: देवी की महिमा, देवी के स्वरूप और असुरों पर विजय से संबंधित प्रमुख पुराणिक ग्रंथ।
2. द्रिक पंचांग — घटस्थापना पूजा विधि: घटस्थापना का समय, पूजन सामग्री, कलश की तैयारी और देवी के आवाहन की प्रचलित विधि।
3. द्रिक पंचांग — कलश स्थापना विधि: पृथ्वी, धान्य, कलश और वरुण से संबंधित मंत्रों का पाठ।
4. द्रिक पंचांग — दुर्गासप्तशती नवार्ण विधि: नवार्ण मंत्र और दुर्गासप्तशती की पाठ-परंपरा से संबंधित संदर्भ।
इन स्रोतों को संबंधित विषय की पुष्टि के लिए देखा जा सकता है।
किसी विशेष मंत्र के शब्द, स्वर या किसी अनुष्ठान की अनिवार्यता का अंतिम निर्णय करते समय प्रमाणित मूल पाठ और अपनी मान्य पूजा - परंपरा को प्राथमिकता देनी चाहिए।
!!!!! शुभमस्तु !!!
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