सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
त्रिदेवी रहस्यम् :
🌻🌷🌻🌻🌷🌻🌻
सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती ये त्रिदेव की पत्नियां हैं।
इनकी कथा के बारे में लोगों में बहुत भ्रम है।
पुराणों में इनके बारे में भिन्न भिन्न जानकारियां मिलती है।
माता अम्बिका : ब्रह्मा, विष्णुन और महेश को ही सर्वोत्तम और स्वयंभू मान जाता है।
क्या ब्रह्मा, विष्णु और महेश का कोई पिता नहीं है ?
ArtX Shree Yantra For Wealth And Happiness Photo Frame, Multicolor, 9.8 X 9.8 in, Set of 1
Visit the ArtX Store https://amzn.to/4rMAUWm
वेदों में लिखा है कि जो जन्मा या प्रकट है वह ईश्व्र नहीं हो सकता।
ईश्वशर अजन्मा, अप्रकट और निराकार है।
शिवपुराण के अनुसार उस अविनाशी परब्रह्म ( काल ) ने कुछ काल के बाद द्वितीय की इच्छा प्रकट की।
उसके भीतर एक से अनेक होने का संकल्प उदित हुआ।
तब उस निराकार परमात्मा ने अपनी लीला शक्ति से आकार की कल्पना की, जो मूर्तिरहित परम ब्रह्म है।
परम ब्रह्म अर्थात एकाक्षर ब्रह्म।
परम अक्षर ब्रह्म।
वह परम ब्रह्म भगवान सदाशिव है।
+++
+++
एकांकी रहकर स्वेच्छा से सभी ओर विहार करने वाले उस सदाशिव ने अपने विग्रह ( शरीर ) से शक्ति की सृष्टि की, जो उनके अपने श्रीअंग से कभी अलग होने वाली नहीं थी।
सदाशिव की उस पराशक्ति को प्रधान प्रकृति, गुणवती माया, बुद्धि तत्व की जननी तथा विकाररहित बताया गया है।
वह शक्ति अम्बिका ( पार्वती या सती नहीं ) कही गई है।
उसको प्रकृति, सर्वेश्वरी, त्रिदेव जननी ( ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माता ), नित्या और मूल कारण भी कहते हैं।
सदाशिव द्वारा प्रकट की गई उस शक्ति की 8 भुजाएं हैं।
पराशक्ति जगतजननी वह देवी नाना प्रकार की गतियों से संपन्न है और अनेक प्रकार के अस्त्र शक्ति धारण करती है।
एकांकिनी होने पर भी वह माया शक्ति संयोगवशात अनेक हो जाती है।
उस कालरूप सदाशिव की अर्द्धांगिनी हैं जिसे जगदम्बा भी कहते हैं।
उसी के तीन प्रमुख रुप हैं, जो तीन देवियों के रुप में पूजे जाते हैं।
अर्थात् सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती।
माता सरस्वती का परिचय :
देवी सरस्वती का वर्ण श्वेंत है।
ब्रह्मा के कई पुत्र और पुत्रियां थे।
+++
+++
सरस्वती देवी को शारदा, शतरूपा, वाणी, वाग्देवी, वागेश्वरी और भारती भी कहा जाता है।
सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्माजी ने मनुष्य योनि की रचना की, परंतु वह अपनी सर्जना से संतुष्ट नहीं थे...!
तब उन्होंने विष्णु जी से आज्ञा लेकर अपने कमंडल से जल को पृथ्वी पर छिड़क दिया...!
जिससे पृथ्वी पर कंपन होने लगा और एक अद्भुत शक्ति के रूप में चतुर्भुजी सुंदर स्त्री प्रकट हुई।
जिनके एक हाथ में वीणा एवं दूसरा हाथ वर मुद्रा में था।
वहीं अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी।
जब इस देवी ने वीणा का मधुर नाद किया तो संसार के समस्त जीव - जंतुओं को वाणी प्राप्त हो गई, तब ब्रह्माजी ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा।
सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है।
संगीत की उत्पत्ति करने के कारण वह संगीत की देवी भी हैं।
वसंत पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं।
माता लक्ष्मी का परिचय : ऋषि भृगु की पुत्री माता लक्ष्मी थीं।
उनकी माता का नाम ख्याति था।
( समुद्र मंथन के बाद क्षीरसागर से जो लक्ष्मी उत्पन्न हुई थी उसका इनसे कोई संबंध नहीं।
हालांकि उन महालक्ष्मी ने स्वयं ही विष्णु को वर लिया था। )
+++
+++
महउर्षि भृगु विष्णु के श्वसुर और शिव के साढू थे।
महर्षि भृगु को भी सप्तर्षियों में स्थान मिला है।
राजा दक्ष के भाई भृगु ऋषि थे।
इसका मतलब राजा दक्ष की भतीजी थीं।
माता लक्ष्मी के दो भाई दाता और विधाता थे।
भगवान शिव की पहली पत्नी माता सती उनकी ( लक्ष्मीजी की ) सौतेली बहन थीं।
सती राजा दक्ष की पुत्री थी।
माता लक्ष्मी के 18 पुत्रों में से प्रमुख चार पुत्रों के नाम हैं:-
आनंद, कर्दम, श्रीद, चिक्लीत।
माता लक्ष्मी को दक्षिण भारत में श्रीदेवी कहा जाता है।
लक्ष्मी - विष्णु विवाह कथा : जब लक्ष्मीजी बड़ी हुई तो वह भगवान नारायण के गुण - प्रभाव का वर्णन सुनकर उनमें ही अनुरक्त हो गई और उनको पाने के लिए तपस्या करने लगी उसी तरह जिस तरह पार्वतीजी ने शिव को पाने के लिए तपस्या की थी।
वे समुद्र तट पर घोण तपस्या करने लगीं।
तदनन्तर लक्ष्मी जी की इच्छानुसार भगवान विष्णु ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।
दूसरी विवाह कथा : एक बार लक्ष्मीजी के लिए स्वयंवर का आयोजन हुआ।
माता लक्ष्मी पहले ही मन ही मन विष्णु जी को पति रूप में स्वीकार कर चुकी थी लेकिन नारद मुनि भी लक्ष्मीजी से विवाह करना चाहते थे।
नारदजी ने सोचा कि यह राजकुमारी हरि रूप पाकर ही उनका वरण करेगी।
तब नारदजी विष्णु भगवान के पास हरि के समान सुन्दर रूप मांगने पहुंच गए।
विष्णु भगवान ने नारद की इच्छा के अनुसार उन्हें हरि रूप दे दिया।
हरि रूप लेकर जब नारद राजकुमारी के स्वयंवर में पहुंचे तो उन्हें विश्वास था कि राजकुमारी उन्हें ही वरमाला पहनाएगी।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
राजकुमारी ने नारद को छोड़कर भगवान विष्णु के गले में वरमाला डाल दी।
नारद वहाँ से उदास होकर लौट रहे थे तो रास्ते में एक जलाशय में अपना चेहरा देखा।
अपने चेहरे को देखकर नारद हैरान रह गये क्योंकि उनका चेहरा बन्दर जैसा लग रहा था।
हरि का एक अर्थ विष्णु होता है और एक वानर होता है।
भगवान विष्णु ने नारद को वानर रूप दे दिया था।
नारद समझ गए कि भगवान विष्णु ने उनके साथ छल किया।
उनको भगवान पर बड़ा क्रोध आया।
नारद सीधा बैकुण्ठ पहुँचे और आवेश में आकर भगवान को श्राप दे दिया कि आपको मनुष्य रूप में जन्म लेकर पृथ्वी पर जाना होगा।
जिस तरह मुझे स्त्री का वियोग सहना पड़ा है उसी प्रकार आपको भी वियोग सहना होगा।
इस लिए राम और सीता के रूप में जन्म लेकर विष्णु और देवी लक्ष्मी को वियोग सहना पड़ा।
समुद्र मंथन वाली लक्ष्मी : समुद्र मंथन से उत्पन्न लक्ष्मी को कमला कहते हैं जो दस महाविद्याओं में से अंतीम महाविद्या है।
देवी कमला, जगत पालन कर्ता भगवान विष्णु की पत्नी हैं।
+++
+++
देवताओं तथा दानवों ने मिलकर, अधिक सम्पन्न होने हेतु समुद्र का मंथन किया, समुद्र मंथन से 18 रत्न प्राप्त हुए, जिन में देवी लक्ष्मी भी थी, जिन्हें भगवान विष्णु को प्रदान किया गया तथा उन्होंने देवी का पानिग्रहण किया।
देवी का घनिष्ठ संबंध देवराज इन्द्र तथा कुबेर से हैं, इन्द्र देवताओं तथा स्वर्ग के राजा हैं तथा कुबेर देवताओं के खजाने के रक्षक के पद पर आसीन हैं।
देवी लक्ष्मी ही इंद्र तथा कुबेर को इस प्रकार का वैभव, राजसी सत्ता प्रदान करती हैं।
माता सती या पार्वती का परिचय - माता सती को ही पार्वती, दुर्गा, काली, गौरी, उमा, जगदम्बा, गिरीजा, अम्बे, शेरांवाली, शैलपुत्री, पहाड़ावाली, चामुंडा, तुलजा, अम्बिका आदि नामों से जाना जाता है।
कहते हैं कि माता सती के ही ये नए जन्म थे।
यह किसी एक जन्म की कहानी नहीं कई जन्मों और कई रूपों की कहानी है।
जो भी हो इस गुत्थी को सुलझाना थोड़ा मुश्किल है।
माता पार्वती का परिचय : माता पार्वती शिवजी की दूसरी पत्नीं थीं।
मान्यता अनुसार शिवजी की तीसरी पत्नी उमा और चौथी काली थी।
हालंकि इन्हें पार्वती का ही भिन्न रूप भी माना जाता है।
पार्वती माता अपने पिछले जन्म में सती थीं।
सती माता के ही 51 शक्तिपीठ हैं।
माता सती के ही रूप हैं जिसे 10 महाविद्या कहा जाता है- काली, तारा, छिन्नमस्ता, षोडशी, भुवनेश्वरी, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला।
पुराणों में इनके संबंध में भिन्न भिन्न कहानियां मिलती है।
दरअसल ये सभी देवियों की कहानी पुराणों में अलग - अलग मिलती है।
इनमें से कुछ तो पार्वती का रूप या अवतार नहीं भी है।
दिव्योर्वताम सः मनस्विता: संकलनाम ।
त्रयी शक्ति ते त्रिपुरे घोरा छिन्न्मस्तिके च।।
देवी पार्वती के पिता का नाम हिमवान और माता का नाम रानी मैनावती था।
माता पार्वती की एक बहन का नाम गंगा है, जिसने महाभारत काल में शांतनु से विवाह किया था और जिनके नाम पर ही एक नदी का नाम गंगा है।
माता पार्वती को ही गौरी, महागौरी, पहाड़ोंवाली और शेरावाली कहा जाता है।
अम्बे और दुर्गा का चित्रण पुराणों में भिन्न मिलता है।
अम्बे या दुर्गा को सृष्टि की आदिशक्ति माना गया है जो सदाशिव ( शिव नहीं ) की अर्धांगिनी है।
माता पार्वती को भी दुर्गा स्वरूप माना गया है, लेकिन वे दुर्गा नहीं है।
नवरात्रि का त्योहार माता पार्वर्ती के लिए ही मनाया जाता है।
पार्वती के 9 रूपों के नाम हैं- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति.चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति.महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।
माता पार्वती के 6 पुत्रों में से प्रमुख दो पुत्र हैं:- गणेश और कार्तिकेय।
भगवान गणेश के कई नाम है उसी तरह कार्तिकेय को स्कंद भी कहा जाता है।
इनके नाम पर एक पुराण भी है।
इस के अलावा उन्होंने हेति और प्रहेति कुल के एक अनाथ बालक सुकेश को भी पाला था।
सुकेश से ही राक्षस जाति का विकास हुआ।
इस के अलावा उन्होंने भूमा को भी पाल था जो शिव के पसीने से उत्पन्न हुआ था।
जलंधर और अयप्पा भी शिव के पुत्र थे लेकिन पार्वती ने उनका पालन नहीं किया था।
माता पार्वती की दो सहचरियां जया और विजया भी थीं।
पौराणिक मान्यता अनुसार भगवान शिव की चार पत्नियां थीं।
पहली सती जिसने यज्ञ में कूद कर अपनी जान दे दी थी।
यही सती दूसरे जन्म में पार्वती बनकर आई, जिनके पुत्र गणेश और कार्तिकेय हैं।
फिर शिव की एक तीसरी पत्नी थीं जिन्हें उमा कहा जाता था।
देवी उमा को भूमि की देवी भी कहा गया है।
उत्तराखंड में इनका एकमात्र मंदिर है।
भगवान शिव की चौथी पत्नी मां महाकाली है।
उन्होंने इस पृथ्वी पर भयानक दानवों का संहार किया था।
🌻🌻🌷🌻🌻🌷🌻🌻🌷🌻🌻
🚩🌹🌿जय माता दी🌿🌹🚩
🙏जय द्वारकाधीश वंदन अभिनंदन मित्रों👏
🌺🍀शुभ और मंगलमय हो जय श्री कृष्ण🍀🌺
!!!!! शुभमस्तु !!!
🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
" Opp. Shri Ramanatha Swami Kovil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits, V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85 Web: Sarswatijyotish.com
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद..
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏
.jpg)
No comments:
Post a Comment